भारतकोश
संग्रह पर लौटें

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

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नाम हो, वो जानता है कि इसी से मनुष्य के मन को साफ़ करके उसे अच्छा बनाया जा सकता है।

नाम बिना हृदय शुद्ध न होई। कोटिन भांति करे जो कोई॥

साहिब की वाणियाँ इस बात को स्पष्ट कर रही हैं कि नाम के बिना मन अच्छा नहीं हो सकता है, चाहे कोई करोड़ों उपाय क्यों न कर ले। फिर जो अन्य उपायों का सुझाव दे तो यही समझना चाहिए कि उसके पास नाम का होना तो दूर, उसे इस नाम के बारे में कोई ख़बर ही नहीं है।

बाकी जितने भी गुरु लोग हैं, वो जो नाम दे रहे हैं, वो निरंजन का है। निरंजन यानी मन। मन के नाम द्वारा मन को ही मारने की बात सोची भी कैसे जा सकती है! इसलिए मन को मारने के लिए जो परम पुरुष का सच्चा नाम चाहिए, वो केवल सद्गुरु के ही पास मिल सकता है। यह नाम किसी बिरले संत के पास ही होता है। जब-जब दुनिया इस नाम से बेख़बर हो जाती है तब-तब कबीर साहिब यह नाम लेकर निरंजन के संसार में आते हैं और जीवों को यह नाम रूपी अमोलक वस्तु देकर उनके मन को निर्मल करके उन्हें अपने देश अमर लोक ले जाते हैं।

हरेक अपने गुरु के लिए बढ़ा-चढ़ाकर कहता है। इसलिए आपकी सही तस्वीर संसार के सामने रख पाना बड़ा कठिन कार्य हो जाता है। पर सत्य है कि आप ही साहिब हैं। इसमें कुछ भी बढ़ा-चढ़ाकर कहने वाली बात नहीं है। यह एक परम रहस्य है। आपसे नाम पाकर कुछ हद तक इस रहस्य को समझा जा सकता है। जो खोजी होगा, वो अवश्य ही इस रहस्य को समझ जायेगा।

कहने का भाव है कि अभी तक यह नाम किसी के पास नहीं है। यह आपसे ही प्राप्त किया जा सकता है। इस नाम के दाता इस युग में अभी तक आप ही हैं अन्य कोई नहीं। आपका नाम सबसे निराला है। आपका नाम काल के चंगुल से छुड़ाने वाला है। आपना नाम इंसान को निर्मल

अभियान चलाया

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करने वाला है। आपका नाम पाकर हरेक नामी के हृदय से बस यही शब्द निकलते होंगे। चाहे वो वाणी में प्रकट न कर पाए, पर अंदर-ही-अंदर वो ज़रूर गुणगुनाता है-

बड़ा ही अद्भुत नाम तुम्हारा,
साहिब सच सच कहते हैं।
मैं न कहता आप न कहते,
साहिब सब यह कहते हैं॥
जब से साहिब नाम मिला है,
इच्छा कोई रही न बाकी,
चिंता सारी भाग चुकी है,
नाम सुधा पीकर हम साहिब,
खोए खोए रहते हैं।
मैं न कहता आप न कहते,
साहिब सब यह कहते हैं॥
जो जन आते शरण आपकी,
काल से मुक्ति वे जन पाते,
वे फिर आपमें और आप उनमें,
सदा सदा फिर रहते हैं॥
मैं न कहता आप न कहते,
साहिब सब यह कहते हैं॥

अभियान चलाया

जब आप मात्र 20 साल के थे तो आपने सोचा कि देश-विदेश के महात्माओं के पास जाता हूँ, देखता हूँ कि कौन कहाँ तक पहुँचा हुआ है। आप बड़े-बड़े महात्माओं से मिले, जिनकी लाखों की संगत थी। पर

आपका ज्ञान देख वैज्ञानिक भी दंग रह गये

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जब गोष्ठी हुई तो आपने पाया कि किसी को भी अमर लोक का ज्ञान नहीं था। आप जाते ही पहले कहते कि मैंने जो पाना था, पा चुका हूँ; मुझे केवल यह बता दो कि आप अंदर की दुनिया में कहाँ तक गये हो? तो आपने पाया कि किसी को भी आंतरिक दुनिया का ज्ञान नहीं था; अमर लोक बहुत दूर की बात है। कुछ केवल पढ़-सुन कर बोल रहे थे। आप समझ गये कि ये झूठ बोल रहे हैं।

आपका ज्ञान देख वैज्ञानिक भी दंग रह गये

सोलन में आपका प्रोग्राम था। यूनिवर्सिटी के सभी छात्र और प्रोफेसर भी थे। उन्होंने सोचा कि यह बाबा जी हैं, ऐसे ही होंगे। उन्होंने आपसे बड़े सवाल पूछे। लोगों ने धर्मशास्त्र तो पढ़े हैं, पर अधूरे। आप एकाग्र होकर सबकुछ करते हैं। इसलिए धर्मशास्त्रों का आपको ज्ञान भी सबसे अच्छा है। बाद में आपने एक वैज्ञानिक से पूछा कि पेड़ की ज़मीन में नमी क्यों है? वो वनस्पतिशास्त्र का वैज्ञानिक था। वो बोला कि छाया से। आपने कहा कि ऐसा करना कि मकान के नीचे से भी ज़मीन खोदना। वहाँ की ज़मीन खुश्क होगी। पर पेड़ के नीचे की ज़मीन में नमी मिलेगी।

पहले वो कह रहे थे कि अध्यात्म कुछ नहीं है, विज्ञान ही सब कुछ है। पर जब आप विज्ञान से अध्यात्म की ओर चले तो सब दंग रह गये।

तो आपने उसे समझाया कि पेड़ अपने नजदीक 10 मीटर तक सूर्य की किरणों को नहीं आने देता। उसकी पत्तियों में यह गुण हैं। क्योंकि वो जानता है कि यदि ऐसा नहीं किया तो वो नष्ट हो जायेगा। इसलिए आत्म-रक्षा के लिए वो किरणों को दूर फेंकता है। यह काम मकान नहीं कर सकता है। इसलिए हमारे पूर्वज लोग पेड़ की छाया में आराम करते थे, क्योंकि वे ठंडक महसूस करते थे।

वाणी पर पूरा कण्ट्रोल रहता है आपका

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सब आपकी बातें सुनकर हैरान रह गये। वो तो पी.एच.डी थे, पर आपका तो विषय भी नहीं था वनस्पति शास्त्र। आपने उसी से संबंधित ही सवाल पूछे। वो नहीं बता पाए। आपने उन्हें समझाया। फिर वे सहमत हुए, कहा कि आप ठीक कह रहे हैं।

वाणी पर पूरा कण्ट्रोल रहता है आपका

आपका अपनी वाणी पर पूरा कण्ट्रोल रहता है। फिजूल नहीं बोलते हैं आप। आपने कभी किसी को आशीर्वाद नहीं दिया। किसी भी बेकार बात को नहीं बोलते हैं। कई लोग डोगरी में बड़ी बातें बोलते हैं, जो अन्य भाषा में गाली हो जाती है। इस तरह अन्य भाषाओं के कुछ शब्द यहाँ गाली बन जाते हैं। इसलिए शब्द सोच-विचार कर बोलना चाहिए। आपकी वाणी में कभी गाली नहीं निकलती है। आपकी हर बात सत्य होती है। आप सत्लोक में रहते हैं और सत्य की बात ही करते हैं।

आप दीन दुखियों के हैं

अगर देखा जाए तो दो तरह के लोग आपके पास आते हैं। 90 प्रतिशत तो बीमार, असहाय, परेशान लोग होते हैं, पर 10 प्रतिशत लोग होते हैं, जो शौकिया आते हैं।

10 साल पहले की बात है, एक महाजन ने आपको रामगढ़ में ज़मीन दी। जब आप बाद में वहाँ आश्रम बनवाने पहुँचे तो एक नामी लड़का आपके पास आया, कहा कि क्या कर रहे हैं गुरुजी? आपने कहा कि ज़मीन ख़रीदी है, आश्रम बनवा रहा हूँ। उसने कहा-गुरु जी, सब आपका ही है, कोई बात नहीं, पर जहाँ आप आश्रम बनवा रहे हैं, वो तो मेरी ज़मीन है; आपने किससे ज़मीन ख़रीदी है? आपने कहा कि फलाने महाजन ने ज़मीन दी थी। उसने कहा कि उसकी तो वहाँ छपड़ी में है। आपने महाजन से मिलकर कहा कि आपने बताई यह थी, पर है आपकी

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जगह वहाँ छपड़ी में। महाजन ने कहा-महाराज! मैं कोई खेती-बाड़ी तो करता नहीं हूँ; लोगों ने मिट्टी निकाल-2 कर इसे खाली कर दिया है। आपने कहा कि यह ठीक नहीं है; वापिस लो। तो उसने कहा कि लिखा-पढ़ी करके दे दो। आपने सोचा कि पहले भी लिखा-पढ़ी करके ली थी, अब वापिस भी लिखा-पढ़ी करके देंगे तो पैसे लगेंगे, इसलिए आपने कहा रहने दो लिखा-पढ़ी को छपड़ी वाली को ही ठीक कर लेंगे। आपने अपने लोगों को कहा कि इसे भरते हैं; एक ट्रेक्टर आश्रम का देता हूँ, एक आप किसी सौखे नामी का ले लो और इसे भर दो। तो एक ने कहा कि यहाँ कोई सौखा नामी नहीं है। सब ऐसे ही हैं। उसने कहा कि जो सौखे-सौखे थे, उन्हें एक दूसरे पंथ वाले ले गये। किसी को कहा कि चल वहाँ, जत्थेदार बना देंगे, किसी को कहा कि फलाना बना देंगे। फिर गुरु जी, जो खाने-पीने वाले थे, वो एक दूसरे पंथ वाले ले गये, कहा कि जो मरजी खाओ-पीओ, मौज-मस्ती करो और भक्ति भी करो। फिर आपके लिए बचे ही लूले, लँगड़े, बीमार। अब आपका प्रचार भी यही कर रहे हैं; कोई पागल दिखता है तो कहते हैं कि चल राँजड़ी; फिर कोई भूत-प्रेत वाला दिखता है तो कहते हैं कि चल राँजड़ी। आपने कहा कि वो भी ठीक हैं।

बाकी देखते हैं कि अच्छे कपड़े पहने हुए हैं तो छाँटते जाते हैं; पैसे, रुतबे आदि को देखकर छाँटते हैं। आप सीधा आँखों में देखते हैं; आप श्रद्धा, प्रेम और रूहानियत को देखते हैं। वो अंदर की आस्था नहीं देख रहे हैं, बाहरी भेष-भूषा देख रहे हैं। वो यह देख रहे हैं कि हमें क्या दे सकता है! आप देखते हैं कि मुझसे क्या ले सकता है!

एक नामी अपने ससुराल गया तो वहाँ अपनी सास को समझाकर लाया। वो 60 साल से दूसरे पंथ में मशहूर थी; बड़ी ज्ञानी थी; कई लोगों को भी नाम दिलवाया था। जब वो आपसे नाम ले लिया तो नामी के एक दोस्त ने उनसे कहा कि आपने यह क्या किया, इतनी इज्जत थी आपकी

इसलिए जगह-जगह आश्रम बनवाते हैं आप

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वहाँ। इतने बड़े पंथ को छोड़कर आप साहिब-बंदगी में चली गयीं। आपको क्या अंतर दिखा वहाँ? माई ने बड़ा प्यारा जवाब दिया, कहा कि वो महाराज है सौखों का और राँजड़ी वाला है औखों का।

राँजड़ी में सुबह-सुबह कई परेशान, बीमार आते हैं; अपनी-2 समस्याएँ लाते हैं। आप यह नहीं देखते कि यह ग़रीब है या अमीर; आप सबकी सुनते हैं। आपमें किसी तरह की भेद-दृष्टि नहीं है। आप तो केवल आने वाले का प्रेम, उसका विश्वास, उसकी प्रार्थना को ही देखते हैं।

इसलिए जगह जगह आश्रम

बनवाते हैं आप

आपने जो इतने अधिक आश्रमों को निर्माण करवाया, जगह-जगह आश्रम बनवाए, इसके पीछे भेद है। डोडा की एक माई ने आपसे नाम लिया। वो भक्त थी। पर कुछ महीने वो सत्संग में नहीं आई। बहुत देर बाद जब मिली तो आपने न आने का कारण पूछा। माई ने कहा कि गुरु जी, इतनी दूर से राँजड़ी आने में बहुत पैसे लगते हैं; मैं ग़रीब हूँ। आपने उसी समय फैसला किया कि वहाँ आश्रम बनवाऊँगा।

ऐसे ही मण्डी के एक महात्मा जी ने नाम लिया। उनके शिष्यों ने भी नाम ले लिया। पर कुछ समय न देखा तो आपने महात्मा जी से पूछा कि आपके चेले अब नहीं आ रहे हैं, क्या बात है? तो उन्होंने बताया कि मण्डी से राँजड़ी तक पहुँचने में 700 रूपये लगते हैं और तीन दिन लग जाते हैं। इसलिए आप खुद हरेक जगह आश्रम बनवाकर वहाँ जा रहे हैं।

ऐसे फिर आप जगह-जगह पहले आश्रम बनवाने लगे और फिर भक्तों को इकट्ठा करने लगे। 10-10, 15-15 कि. मी. की दूरी पर आपने आश्रम बनवाए। ग़रीब संगत आपके दर्शन करने नहीं पहुँच पाती है, यह सोचकर सद्गुरु जी स्वयं उन्हें दर्शन देने प्रत्येक आश्रम में जाते हैं।

सिद्धांत के इतने पके हैं आप

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सिद्धांत के इतने पक्के हैं आप

आपने एक ज़मीन ख़रीदी। 8 लाख की ज़मीन थी। फ़र्द कटवाना था तो पटवारी 10 हज़ार माँग रहा था और बड़े अधिकार से माँग रहा था घूस। आपने अपने नामी तहसीलदार से कहा कि घूस नहीं देना है, यह तय है; चाहे फ़र्द न हो, मंजूर है। आपने 8 लाख दाँव पर लगा दिये, पर 10 हज़ार घूस नहीं दी। सिद्धांत ख़त्म हो रहा था, इसलिए किया।


इंस्पेक्टर बोला-

दो साल नौकरी आपने की है

सच है, कर्त्ता केवल आप ही हैं, बाकी सब तो माध्यम बन जाते हैं। अंतर केवल इतना है कि कोई-कोई इस रहस्य को समझ नहीं पाता है जबकि कुछ इस बात को समझ जाते हैं, महसूस कर लेते हैं।

सुरेंद्र सिंह इंस्पेक्टर को दिमाग़ी नुक़्स हो गया था। वो आपके पास आया; कहा-गुरु महाराज! अब नौकरी नहीं करनी है। आपने उसकी आँख में देखा। आप जान गये कि क्या बात है। आपने कहा कि नौकरी पूरी करो। उसके 2 साल रह गये थे। आपने उसे चाॅबी भर दी। पर आपने ऐसा नहीं कहा कि चाॅबी भर दी है, जाओ। यह नहीं बोला कि तथास्तु।

वो पूरी नौकरी करके आया तो एक लाख रूपया लाकर चरणों में रखा। वो बोला कि मैं आपसे बेइमानी कर रहा हूँ। यह दो साल नौकरी आपने की है। मैं बेइमान बनकर आपको केवल बेसिक तनख़्वाह दे रहा हूँ।


वापिस आना ही पड़ता है

आपको कोई छोड़ नहीं सकता है। चाहे छोड़कर चला जाए, पर फिर वापिस आना पड़ता है। यदि हज़ारों गुरु भी कर आए तो भी वापिस आपके पास आना पड़ेगा।

केवल श्रद्धा देखते हैं आप

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आपकी अपने हरेक नामी पर नज़र रहती है। आपको पता रहता है कि कौन कितनी देर नहीं आया। एक लड़का था। उसका सेक्शन ऑफिसर का टेस्ट था। वो बोला कि दो बार फेल हो चुका हूँ, यह तीसरा आखिरी चाँस है। वो कुदरतन फेल हो गया। सोचा कि छोड़ो, नहीं जाना है। 5-6 महीने नहीं आया। फिर बाद में आया तो आप सत्संग कर रहे थे कि साहिब का द्वार नहीं छोड़ना है। वो उठा-बोला कि छोड़ना क्या है, छोड़ ही नहीं पाते हैं। फिर बाद में नियम ही बदल गया कि तीन बार के बाद भी दे सकते हैं। फिर दुबारा टेस्ट दिया तो पास हो गया।

केवल श्रद्धा देखते हैं आप

एक माई आपके पास आई, कहा कि बच्चे का नाम रखना है। आपने पूछा कि लड़का है या लड़की। वो बोली कि लड़का है। आपने कहा कि इसका नाम 'अनाम' रखो। वो चली गयी। लेकिन फिर पाँच मिनट बाद वापिस आई, कहा कि नाम बदल दो। आपने कहा कि फिर 'अजय' है इसका नाम। माई 5 मिटन बाद फिर आई, कहा कि यह लड़की है। आपने कहा कि पहले बताना था न। पर आप उससे नाराज़ नहीं हुए, बल्कि मुस्कराते हुए नाम बदल कर रख दिया। यानी वो समझ नहीं पा रही थी। जब वो बाहर जा रही थी तो कोई पूछ रहा था कि क्या नाम रखा है? वो जब बता रही थी तो वो कह रहा होगा कि यह तो लड़कों वाला नाम है। तब वो फिर वापिस आ रही थी। पर आप ऐसे लोगों की केवल श्रद्धा ही देखते हैं, भाषा नहीं समझ पा रही थी कि क्या हुआ!

आपकी तान निराली है

बाहर बहुत से संगीत बज रहे हैं, बड़े सुरों से गीत गाए जा रहे हैं। अंदर में भी बड़े बाजे बज रहे हैं, बड़ी निराली धुनें हो रही हैं, जिनकी तुलना में बाहर की धुनें कुछ भी नहीं हैं। वो बड़ी ही प्यारी धुनें हैं। हर

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तरह के वाद्य यंत्र बज रहे हैं। इन बाहर और भीतर दोनों से परे आप जो प्रेम की तान छेड़ते हैं, उसकी तुलना में दोनों तान फीकी पड़ जाती हैं। जो एक बार आपकी तान सुन ले, वो आपका प्रेमी होगा-ही-होगा। वो प्रेम की तान है। वो आत्मा तक जाती है। उसे आत्मा ग्रहण करती है।

कान के रास्ते से वो तान अंदर में आती है। यह भी कई तरह की है। एक तो आते ही विरह उत्पन्न कर देती है जबकि एक प्रेम की तान है, जो प्रेम भाव को उत्पन्न करती है। इनके अलावा कुछ तान सिग्नल देती हैं। मान लो कि आप सत्संग में किसी को बुलाना चाहते हैं तो एक गुप्त तरीके के साथ-२ वो खास तरह की तान सुनाकर भी बुलाते हैं।

जब प्रेम की ये तान आप सुनाते हैं तो शरीर की सुध भूल जाती है। जब तक वो तान रहती है, अपने में ही समाए रखती है। कभी वो तान पल-भर के लिए आती है तो कभी कुछ लंबे समय के लिए भी रह जाती है।

संगीत का प्रेमी उस तान को सुनकर निश्चय ही संगीत की हर तान भूल जायेगा। अनहद शब्द का प्रेमी उसे सुनकर अनहद शब्द को सुनना नहीं चाहेगा। वो तान ऐसी है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। बस, यों समझ लेना चाहिए कि जैसे प्रेम बताने में नहीं आता, ऐसे वो प्रेम की तान बताई नहीं जा सकती है।

फिर एक जो आप सुरति को पकड़कर अपना शब्द सुनाते हैं, उसकी तो बात ही नहीं की जा सकती है। वो सुनने वाला तो खो ही जायेगा। फिर उसे कहीं भी चैन नहीं आ सकता है। उसी का दीवाना वो हो जायेगा। वो इतना मीठा है कि उसके लिए कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। इसलिए यह तो परम सत्य है कि आपकी हर बात निराली है। आप इस संसार के हो ही नहीं। आप स्वयं ही सब कुछ हैं, पर यह बात बोलने से दुनिया मानेगी नहीं, विश्वास नहीं करेगी, शायद इसलिए आप भी 'साहिब-साहिब' बोल रहे हैं।

आपका भोजन भी सबसे निराला है

64 <p align="right">साहिब बन्दगी</p>

जो जन आया शरण आपकी, भ्रम सब उसका काट निकाला।
अपनी मीठी तान सुना, आपने उसे मधुमय कर डाला॥

आपका भोजन भी सबसे निराला है

जो भोजन आप खाते हैं, कोई नहीं खा सकता है। आप तो बस इस शरीर रूपी घोड़े को स्वस्थ रखने के लिए भोजन लेते हैं। आपको स्वाद से कोई मतलब नहीं है। आपके भोजन को निगल पाना भी आम इंसान के लिए बहुत कठिन हो जायेगा।

एक बार आपके भाई ने आपसे कहा कि मैं आपको परमात्मा मानता हूँ। आपने कहा कि तुम्हारा यह मानने का आधार क्या है? उन्होंने कहा कि मैं आपकी आध्यात्मिक गहराई को नाप नहीं पाया हूँ, पर कुछ चीज़ें मैंने आपमें देखी हैं। पहले तो आपको दुनिया का कोई शौक नहीं है। आपके पास मन नाम की कोई चीज़ ही नहीं है। उन्होंने बहुत बातें कहीं। फिर कहा एक बार मैंने आपका बचा हुआ भोजन खा लिया। मुझे 7-8 मिर्च खानी पड़ीं, तब जाकर वो भोजन मैं गले से नीचे उतार पाया। आपके भोजन में कोई नमक, कोई स्वाद नहीं, कैसे खाते हो!

आप दुनिया का कोई भी मज़ा नहीं लेते हैं। इन मज़ों की ज़रूरत केवल उसी को होती है, जिसे आत्मा का आनन्द नहीं मिला हो।

बड़ा अन्याय किया जाता है आपके साथ

आपके साथ हर समय अन्याय ही होता रहा है। समाज में पाखण्डियों का ही बोलबाला होने के कारण ही यह सब होता रहा है। 30 जनवरी सन् 2008 की बात है। गाँधी जी की 60वीं पुण्यतिथि थी। आपको जम्मू के मुबारक मण्डी में आमंत्रित किया गया। वहीं पर आपको सन् 2003 को सन् 2002 का गाँधी शांति पुरस्कार भी दिया गया था। तब भी आपके साथ कुछ शैतान लोगों ने ऐसा ही किया था।

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इस बार ऐसा था कि वहाँ पर दो माइक लगे थे। एक छोटा माइक था, जहाँ से स्कूली बच्चे गाँधी के विचारों का प्रचार कर रहे थे और दूसरा बड़ा मॉइक था, जो बड़े आमंत्रित लोगों के बोलने के लिए था।

जब तक सारे आमंत्रित लोग न पहुँच गये, तब तक बच्चे उस छोटे मॉइक से बोले जा रहे थे। जैसे ही आप पहुँचे, आपको भी उस छोटे मॉइक पर बोलने के लिए बुला लिया गया। अब उस मॉइक से सभी तक आवाज़ नहीं पहुँच पा रही थी और फिर उस समय शोर भी बहुत था; नारे लगाए जा रहे थे। आपने तो भी वहीं से बोला। अब भी अन्दर में चालाक लोगों का दिल नहीं भरा तो बीच-बीच में आपको रोकना शुरू कर दिया और आने वाले के लिए सूचित करते रहे और ऐसे ही बीच में ही आपको रोक दिया गया और आपकी बात अधूरी ही रह गयी।

बाद में जब सब लोग आ गये तो आपको दिखावे के लिए मात्र उनके साथ बिठाया गया। सबको उस बड़े मॉइक पर बोलने का अवसर प्रदान किया गया जबकि आपको केवल वहाँ बिठाए रखा, बोलने का अवसर वहाँ से नहीं दिया गया, जहाँ से आपकी आवाज़ सब सुन सकें, आप अपनी बात सब तक पहुँचा सकें। क्या यह नाइंसाफ़ी नहीं थी। क्या यह चालाकी नहीं थी! पर फिर भी आपकी शालीनता तो देखो, जाते समय आपने दोनों हाथ जोड़कर उसे धन्यवाद किया, जिसने आपको उस माइक पर बोलने का अवसर नहीं दिया और बच्चों वाले माइक से बोलने को कहा।

यह केवल एक किस्सा नहीं है। हर बार जहाँ भी आपको आमंत्रित किया जाता है, पाखण्डियों की टीम इकट्ठा होकर साज़िश रच लेती है और कुछ ऐसा कर दिया जाता है कि आपको बोलने का अधिक अवसर नहीं दिया जाता। पाखण्डी जानते हैं कि आपको

भोजन बड़ा स्वादिष्ट बनाते हैं आप

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बोलने का अधिक अवसर देने का मतलब है लोगों का आपसे प्रभावित होकर आपके साथ जुड़ना।

एक संत को आमंत्रित कर उनका ऐसा अपमान करना केवल असभ्यता की ही निशानी है।

भोजन बड़ा स्वादिष्ट बनाते हैं आप

जो कोई आपके हाथ का बना भोजन एक बार खा ले तो वो कभी जिंदगी भर भूल नहीं सकता है। कई-कई दिन तक आप राँजड़ी में स्वयं भोजन बनाते हैं। फौज में एक बार आपको भी लाँगरी की मदद के लिए जाना पड़ा। उस दिन आपने भोजन बनाया। जब सबने खाया तो कहा कि आज तो भोजन बहुत ही स्वादिष्ट बना है, किसने बनाया है? जब पता चला कि आपने बनाया है तो सबने कहा कि अब आप ही भोजन बनाया करें। आपने कहा कि मैं कोई लाँगरी भर्ती नहीं हुआ हूँ। मैंने कोई ट्रेनिंग भी नहीं की है। पर फिर भी आपको महीना-2 भर भोजन बनाने में लगाए रखते थे।

यह काम आपने 8-9 साल की उम्र में ही सीख लिया था। जब भी माँ बीमार होती तो वो आपसे उम्मीद रखती थी। आप भोजन भी बना लेते थे, कपड़े भी धो लेते थे।

आपके बड़े-बड़े हलवाई भी शिष्य हैं। वे कहते हैं कि जो फार्मूला आपके पास है, वो हम नहीं जानते हैं। वो खुद कहते हैं। सच है कि आपके हाथों में ही कुछ जादू है।

आपने अपने गुरुदेव को भी बहुत बार भोजन बनाकर खिलाया। आपके हाथों का भोजन खाकर गुरुदेव भी बहुत प्रसन्न होते थे। आपके हाथ का भोजन खाने के लिए वे दो महीने आश्रम से बाहर नहीं जाते थे। चाहे कोई भी बुलाता था, वे नहीं जाते थे। वे आपसे कहा करते थे कि जो तुम्हारे हाथ का भोजन खा लेगा, वो साधु हो जायेगा। क्योंकि उसमें कुछ और भी खास बात रहती है, जिसे आपके गुरुदेव समझ गये थे।

सिर पर बैठकर जो चाहते हैं करवा लेते हैं

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जब भी अखनूर में बड़े प्रोग्राम होते हैं तो आप स्वयं ही भोजन बनाते हैं। राँजड़ी में कभी कुछ तो कभी कुछ बनाकर सबको खिलाते हैं। जब यात्रा होती है तो सब थके हुए होते हैं। तब भी आप स्वयं ही सबको बना-बनाकर खिलाते हैं। वो नज़ारा देखते ही बनता है। यात्रा के दौरान किसी आश्रम में पहुँचकर जब सभी थककर सोए हुए होते हैं तो आप चाय पकौड़े आदि बनाकर सबको जगाते हैं और खिलाते हैं। माँ भी बच्चे का इतना ध्यान नहीं रख सकती है, वो भी इतना नहीं कर सकती है। फिर वो तो 2-3 बच्चों को या फिर ज़्यादा-से-ज़्यादा 7-8 बच्चों का ही ध्यान रखती है, पर आप लाखों की संगत का माँ की तरह ध्यान रखते हैं, सबकी सुनते हैं, सबको हौंसला देते हैं; कोई भी मुसीबत आने पर खुद आगे आकर उसे अपने पर लेते हैं, उसका साथ देते हैं। बाहर से भी उसे हौसला देते हैं और अंदर से भी उसे दृढ़ कर देते हैं।

सिर पर बैठकर जो चाहते हैं करवा लेते हैं

पीरखोह जम्मू में रहने वाले एक गरीब लड़के की जायदाद उसके रिश्तेदार हथियाना चाह रहे थे। उसके पास घर में केवल माँ, जो सालों से बीमार चल रही थी, जो खाना तक भी बनाने में सक्षम नहीं थी, और उसकी दादी थी, जो मकान की मालकिन थी। उसने अपने सब बच्चों को अपना-अपना हिस्सा दे दिया था और अब जिस घर में वो रह रही थी, वो उसने उस लड़के के नाम किया हुआ था और अपनी जायदाद का वारिस उसे बताया था। पर रिश्तेदार उसकी दादी को अपने पास ले गये और वहाँ उनकी जायदाद को हड़पने का प्लॉन बनाने लगे। लड़के को एक-एक पाई के लिए तरसाया जाने लगा। उसे सत्संग सुनने के लिए किराया तक बड़ी मुश्किल से मिलने लगा। ऐसे में दुखी होकर उसने आपसे प्रार्थना की। आपने कहा कि दादी को अपने पास ले आओ। लड़के ने कहा कि जब भी वहाँ जाता हूँ तो सब मुझे घेर लेते हैं। मेरा कुछ नहीं चल पा रहा है। आप ही कुछ कृपा करें। आपने कहा कि भरोसा रखना।

वो बोली-मुझे करंट पड़ रही है

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अब ऐसे असहाय के, जिसका कोई नहीं हो, आप सहारे बन जाते हैं। जिन ग़रीबों को दुनिया ठुकराती है, उन्हें आप अपनी कृपा का सहारा देते हैं। बस, फिर क्या था ! अगले ही दिन से सारा माहौल बदल गया। तीसरे दिन उसकी दादी स्वयं ही वहाँ आ गयी और अपने उस वारिस के लिए सबकुछ सुरक्षित करने के लिए, उन धोखेबाजों से बचाने के लिए जुट गयी। यह सब आपका ही काम था। उस समय आप ही सिर ऊपर बैठकर सारा काम करवाने लगे और कुछ ही दिनों में सारा हक़ उसे वापिस मिल गया।

वो बोली-मुझे करेंट पड़ रही है

कटड़े में एक छज्जू राम हैं, जो मखाने वाले के नाम से वहाँ मशहूर हैं। उनके घर में कोई औलाद नहीं थी। बात यह थी कि छज्जूराम की बहन किसी कारण से जलकर मर गयी थी। अब वो उसकी पत्नी के घर में बच्चा नहीं होने दे रही थी। वो उसे सामने दिख जाती थी। वो 4 साल नंगे पाँव माता के दरबार में जाते रहे थे। वो कहती थी कि कहीं भी जाओ, पर मैं बच्चा नहीं होने दूँगी। पाँच बार उसने गर्भ गिरा दिया था। वहाँ एक आपका नामी उनसे मिला तो कहा कि एक बार साहिब के यहाँ भी चलकर देख लो। वो जब आपके पास आए तो आपने कहा कि विश्वास रखो और नाम ले लो। उन दोनों ने आपका नाम ले लिया और आपकी फोटो लेकर घर आ गये। घर आकर पत्नी ने आपकी फोटो कमरे में लगा दी। अब जब गर्भ स्थापित हुआ तो वो आई, पर आपकी फोटो को देखकर पास न आ सकी और दूर से ही बोली कि इस सफेद कपड़े वाले की फोटो को हटा, मुझे करेंट पड़ रही है, मैं रुक नहीं पा रही हूँ। यह कहकर वो चली गयी और फिर दुबारा लौटकर नहीं आई।

लड़की बोली-मेरे साथ साहिब हैं

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लड़की बोली-मेरे साथ साहिब हैं

जब आपका भरोसा आत्मा तक होगा तो कोई कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा। एक लड़का अपने ही मुहल्ले की एक लड़की से एकतरफा प्रेम करता था। वो लड़की आपकी नामिन थी। वो लड़का एक्सीडेंट में मर गया। अब वो रोज़ रात को उसके पास आने लगा। महीना-भर वो उसके पास आता रहा। फिर एक दिन कहा कि मैं शुक्रवार को हमेशा के लिए तुम्हें अपने साथ लेने को आऊँगा। लड़की ने कहा कि हिम्मत हो तो आना; मेरे साथ साहिब हैं। जब वो आया तो लड़की ने कहा कि तू तो मुझे छू भी नहीं पायेगा। तुझे नहीं मालूम है कि मेरे अंदर नाम की ताक़त है। जैसे ही वो लड़की को छूने लगा, उसे करेण्ट पड़ी और वो भाग खड़ा हुआ। उसके बाद वो उसके पास कभी आने की हिम्मत नहीं किया।

एक गुरु शिष्य का नाता ही

मानते हैं आप

आपके लिए संसार के नाते नहीं हैं। आप सच्चे सन्यासी हैं। माँ को दिये बचनो को पूरा करने के लिए महीने में एक बार आप घर जाते हैं। पर आप शरीर के रिश्ते को नहीं मानते हैं। आपसे घर-परिवार वाले भी नाम प्राप्त किये हैं। कोई भी रिश्तेदार आपको रिश्ते से नहीं पुकारता है। सब आपको गुरुजी कहकर बुलाते हैं, साहिब जी कहकर बुलाते हैं।

ऐसी चीज़ों से आप निपट लेते हैं

वैज्ञानिक कह रहे हैं कि तश्तरियाँ (एलियन्स) ब्रह्माण्ड से उतर रही हैं। वे पूरी धरती से इंसान को ख़त्म कर देंगी। आपका मानना है कि ये चीज़ें इंसान का कुछ नहीं बिगाड़ सकती हैं। जब ख़तरनाक डायनासौर

शब्द है आपका वाहन

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साहिब बन्दगी

को इंसान ने टिकने नहीं दिया तो ये क्या चीज़ हैं। पर यदि इंसान उन्हें काबू नहीं कर सका तो आप स्वयं इन चीज़ों से निपट लेते हैं।
आग लगी आकाश में, झर झर गिरे अंगार।
संत न होते जगत में, जल मरता संसार॥
ये बात ऐसे ही नहीं है। इसमें वज़न है। जब तक आप यहाँ पर हैं, आप कुछ भी ऐसा अनर्थ नहीं होने देते हैं। आप कई बार जम्मू में भूकम्प को आने से रोक देते हैं। यदि वो आता है तो नुक़सान नहीं होने देते हैं। आपके इन कार्यों को दुनिया जल्दी नहीं मान सकती है। क्योंकि यह उसकी पकड़ से बाहर है, बुद्धि से परे की चीज़ें हैं। पर आपके नामी इन बातों को समझ लेते हैं। वो ऐसे कि जब नामियों को भूत कुछ नहीं कर पाते हैं तो वो समझते हैं कि कुछ ताक़तें उनकी रक्षा कर रही हैं। भूत जब नामियों को देखकर भाग जाते हैं तो वो अपने पास की रूहानियत को समझते हैं। जब उनके पास ऐसी ताक़तें हैं, जिनसे भूत डर रहे हैं तो आपकी बात क्या करनी! आप क्या नहीं कर सकते हैं! कुछ भी आपके लिए असंभव नहीं है। बारिश नहीं हो रही है तो कर सकते हैं, यदि बारिश बंद करनी हो तो कर सकते हैं, यदि किसी को सज़ा दिलवानी हो तो दिलवा सकते हैं, यदि किसी को सज़ा से मुक्त करना हो तो कर सकते हैं। ये सब आप चुपके से करते भी हैं। क्योंकि आप तमाशे की दुनिया से परे हैं, इसलिए यह सब चुपके से कर देते हैं। केवल नामी लोग ही आपके इन करिश्मों से परिचित हो पाते हैं, क्योंकि आप दुनिया को अपनी ओर खींचने के लिए ये तमाशे नहीं दिखाते। तमाशे दिखाकर आप किसी को अपनी शरण में नहीं लाना चाहते हैं।

शब्द है आपका वाहन

जिस तरह विष्णु जी का वाहन गरुड़ जी हैं, गणेश जी का वाहन चूहा है, लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू है, इस तरह आपका वाहन सत्य शब्द

परमहंस की तरह रहते हैं आप

निराले सद्गुरु
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है। अपने भक्तों की प्रेम पुकार सुनकर आप अपने शब्द रूपी वाहन पर सवार होकर पल भर में उनके पास पहुँच जाते हैं और उसे अपनी तान या मीठा शब्द सुनाकर आनन्दमय कर लौट जाते हैं।

परमहंस की तरह रहते हैं आप

हंस बड़ा प्यारा पक्षी है। वो सुन्दर भी बहुत है। उसमें एक बड़ा प्यारा गुण है। वो दूध और पानी को अलग कर लेता है। यह काम कोई भी नहीं कर सकता है। ऐसे ही आप भी किसी से पक्षपात नहीं करते। चाहे वो आपका नामी हो या कोई और।

एक आदमी आपके पास आया, कहा-गुरु जी, मेरी पत्नी जबसे आपका नाम लेकर गयी है, तबसे घर में लड़ाई लग गयी है। आपने कारण पूछा तो कहा कि पिता जी शिवजी की भक्ति करते हैं। उसने घर आकर शिवजी की फोटो स्टोर में उलटी करके रख दी और आपकी फोटो लगा दी। जब पिता जी ने पूछा तो कहा कि अब यहाँ पर केवल साहिब की फोटो ही लगेगी। पिता जी ने कहा कि हम उनकी भक्ति करते हैं; वो भी रहने दो, साहिब की भी फोटो लगा दो। पर वो नहीं मानी, कहने लगी कि अब तो केवल साहिब की फोटो ही लगनी है। फिर पिता जी गालियाँ देने लगे। आपने कहा कि उनका कोई कसूर नहीं है। सारा कसूर ही माई का है। फोटो से क्या लेना है! फोटो दिल में रख लो, वही काफ़ी है।

जैसे एक माई आपके पास शिकायत लेकर आई कि बंदा आपकी फोटो नहीं लगाने देता है। आपने कहा कि रहने दो, मेरी फोटो को अपने दिल में लगा दो। वो कहने लगी कि पेटी में रखती हूँ तो वहाँ से भी निकाल लेता है। आपने कहा कि दिल की पेटी में रखो न, बाहरी पेटी में क्यों रख रही हो? फिर कहने लगी कि नाम-भजन भी नहीं करने देता।

निंदकों से भी प्रेम करते हैं आप

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आपने कहा कि मत बैठो, चलते-फिरते ही नाम-भजन कर लिया करो। वो कहने लगी कि नाम-भजन करने नहीं देता है। आपने कहा कि कमी तो मुझे तुममें नज़र आ रही है, उसमें नहीं। वो कोई तुम्हारी स्वाँस में तो बैठा नहीं है।

इस तरह कोई भी शिकायत लेकर आता है या कोई विवाद लेकर आपके पास पहुँचा है तो आप दोनों पक्षों को सुनते हैं और पक्षपात रहित होकर फैसला सुनाते हैं। आप किसी की शिकायत सुनकर किसी को कुछ नहीं कहते, बल्कि उसपर विचार करके, दूसरे का पक्ष सुनकर ही कुछ कहते हैं।

निंदकों से भी प्रेम करते हैं आप

आप अपनी संगत से तो प्रेम करते ही हैं, अपने निंदकों के प्रति भी आप किसी तरह का बैर भाव नहीं रखना चाहते हैं। क्योंकि आप जानते हैं कि यदि किसी के प्रति बुरा भाव आ गया तो उसका सर्वनाश हुए बिना नहीं रहेगा। सब अपने ही बच्चे समझकर आप उनके प्रति भी दया का भाव ही रखते हैं।

निंदकों के प्रति किसी इंसान की बुद्धि दया की भावना नहीं रख सकती है। उसके प्रति बैरभाव स्वाभाविक ही होता है। आप तो कहते हैं कि आपका काम ही निंदकों ने किया है। यदि निंदक नहीं होते तो आपका इतना प्रचार होना ही नहीं था। आप उन्हें भोले इंसान समझते हैं, जिनमें विचार करने की शक्ति नहीं है, जो दूसरों से कुछ भी सुनकर उसे सच मान लेते हैं और निंदा शुरू कर देते हैं। जो पाखण्डी हैं, उनकी बात और है, पर आप उनके प्रति भी कोई बैर भाव नहीं रखते हैं, केवल उनसे बचने को कहते हैं।

ये केवल कहने की ही बातें नहीं हैं। आपने अपने हज़ारों निंदकों को क्षमा करके नाम दान तक दिया है। नाम दान के समय आप हरेक

शब्द नहीं देते हैं आप

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को अपनी सुरति भी देते हैं। सुरति देना यानी प्रेम करना। इसका सीधा मतलब है कि आपके दिल में निंदकों के प्रति कोई घृणा है ही नहीं। यदि होती तो आप उन्हें नाम नहीं देते। आपने तो अखनूर आश्रम पर हमला करने वालों को भी नाम दे दिया था। फिर जो बेचारा भोला आदमी केवल बातों से निंदा कर रहा है, उसके प्रति आप क्या घृणा कर सकते हैं। वो बेचारा तो स्वयं ही नरक की ओर जा रहा है। इसके बाद यदि आप उसके प्रति और बैर रखेंगे तो फिर तो उसकी मुक्ति जन्म-जन्मांतरों तक भी नहीं हो पायेगी। यही विचार कर आप किसी के प्रति बैर भाव नहीं रखते हैं। आप यही विचारते हैं कि हो सकता है कि उन्हें पता नहीं है; जब पता चलेगा तो वो भी आयेंगे।

सब आपके ही हैं। यह एक परम रहस्य है, जिसे दुनिया के साधारण जन समझ नहीं पायेंगे। इसी रहस्य के कारण आपके लिए कोई न दोस्त है, न दुश्मन। जो भी जब भी अपनी भूल पर पछचाताप करके आपकी शरण में पहुँच जाता है, आप सहज ही उसे क्षमा करके नाम रूपी दौलत प्रदान कर देते हैं।

शब्द नहीं देते हैं आप

आप कोई भी शब्द बेकार में नहीं बोलते हैं। आपके हरेक शब्द में वज़न होता है। आप कभी किसी को आशीर्वाद नहीं देते कि ‘युग युग जिओ।’ महात्मा लोग ऐसे आशीर्वाद दे देते हैं। पर सच यह है कि ऐसा आशीर्वाद देना झूठ बोलने के बराबर होता है। यह तो अपने सिर पर पाप लादने वाली बात है। क्योंकि यदि जुग-युग जीने का आशीर्वाद दिया तो युग-युग जीने की शक्ति भी देनी होगी। यदि ‘पुत्रवती भवः’ का आशीर्वाद दिया तो बेटा भी देना होगा, नहीं तो झूठ हो जायेगा। इसी कारण आप कोई भी आशीर्वाद नहीं देते हैं।

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जब कोई आपको अपनी समस्या बताता है तो आप उसे यह नहीं कहते कि जाओ, तुम्हारा काम हो जायेगा। क्योंकि यह तो शब्द हो गया। फिर वो होना-ही-होना है। आप दिन भर लोगों की समस्याओं को सुनते हैं और रात को उसकी पूरी रील खोलते हैं। फिर जिस-जिस की समस्या का समाधान करना होता है, या जो कृपा के लायक समझते हैं, उनकी समस्या को चुपके से सुलझा देते हैं।

शब्द क्यों नहीं देते हैं आप? इसके पीछे एक रहस्य है। एक बार एक माई आपके पास आई। उसने फ़रियाद की कि उसके कोई संतान नहीं है; उसे बच्चा दो। आपने कहा-जाओ, पुत्र होगा। आपने शब्द दे दिया। रात को आपको सिग्नल मिला कि आज ठीक नहीं हुआ। जिस स्त्री को पुत्र होने का शब्द मिला है, उसके तो गर्भाशय ही नहीं है। अब पुत्र कैसे हो! तब उस स्त्री का गर्भाशय स्थापित किया गया और फिर उसे पुत्र हुआ। उसके बाद आपने किसी को भी शब्द नहीं दिया। हज़ारों माइयों को आपने पुत्र दिया। पर यह कहकर नहीं दिया कि पुत्र हो। आपने यही कहा कि भरोसा रखना। हज़ारों लँगड़ों की टाँगें आपने ठीक कर दी, पर किसी को नहीं कहा कि ठीक हो जायेगी। आपने भरोसा रखने के लिए कहा। हजारों लायलाज बीमारियों वाले आपके पास आकर ठीक हुए, पर आपने केवल भरोसा रखने के लिए ही कहा, शब्द नहीं दिया कि ठीक कर दूँगा। फिर तो आप शब्द में बँध जाते। फिर यदि वो कृपा का पात्र न होता तो भी आपको उसे ठीक करना पड़ जाता। एक नहीं, दो नहीं, सैकड़ों मृतकों को आपने नवजीवन दिया, पर किसी को यह नहीं कहा कि अभी जीवित करता हूँ। जिसे जीवित करना ज़रूरी समझा, उसे कर दिया। यह रहस्य पुनः जीवन प्राप्त किये हुए ही जानते हैं। यदि आप पहले ही कह देते कि जीवित कर देता हूँ तो गलत भी हो सकता था। यदि वो कृपा का पात्र न होता तो गलत हो जाता।