भारतकोश
संग्रह पर लौटें

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

500 कहानियाँ रोज़ सुननी पड़ती हैं आपको

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सीधा आप पर पड़ रही थी, पर आप लगे रहे, हाथ आगे रखकर सत्संग करते रहे। एक आपके लिए छाता लेकर आया, पर आपको किसी की सेवा भी पसंद नहीं आती है, क्योंकि कन्संट्रेट नहीं होने से गलती कर देते हैं। तो उसने भी दो बार छाता आपके सिर पर लगा दिया। इतने में दूसरा आया, सोचा कि मैं ज़्यादा समझदार हूँ। उसने 10-15 मिनट में ही तीन बार छाता आपके सिर पर लगा दिया। आपने कहा कि दोनो बैठ जाओ अपनी जगह, मैं खुद निपट लूँगा, रहने दो ऐसे ही। तो आप कड़कती धूप में भी लगे रहे।

आपकी एक ही धुन है कि सत्संग द्वारा लोगों को समझाकर सत्य भक्ति में लगाना। चाहे कैसा भी ख़राब मौसम क्यों न हो, आप सत्संग स्थल पर पहुँचते-ही-पहुँचते हैं।


500 कहानियाँ रोज़ सुननी पड़ती हैं आपको

सुबह होते ही लोगों की भीड़ से आप घिर जाते हैं। लगभग 400-500 लोगों से निपटना पड़ता है। दर्शन करने कोई दो ही होते हैं, बाकी अपनी-अपनी समस्याएँ लेकर ही आए होते हैं। फिर कोई आपको ब्रश भी नहीं करने देता, वहाँ भी आकर आपको अपनी-अपनी फरियाद सुनाने लगते हैं। फिर सभी के पास कहानियाँ होती हैं; वो सुना-सुनाकर आपका समय नष्ट करते हैं। पर आप सबकी समस्याओं को शांत होकर सुनते हैं। कुछ डॉ० की रिपोर्ट लेकर आ जाते हैं। अब डॉ० लोगों का

जब आप किसी धर्मस्थान पर जाते हैं

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अपना लिखने का स्टाइल है। तो भी आप पूछते हैं कि डॉ० ने क्या कहा? वे बताते हैं कि यह बताया है। तो आप दवा बताते हैं कि यह करना। पर वो सुनते नहीं हैं।

उदाहरण के लिए एक दिन एक माई आई, उसने कहा कि भूख नहीं लगती। आप जान गये कि क्या समस्या है इसे। आपने कहा कि सुबह मूली, पपीता, खीरा खाना। क्योंकि तीनों भूख वर्द्धक हैं। साथ में कहा कि सुबह एक गिलास पानी में शहद मिलाकर पीना। आप नज़र से पढ़ लेते हैं कि क्या बीमारी है। जब आप दवा बताने लगे तो वो बीच में ही बोल पड़ी कि बड़ी दवाएँ की हैं। आपकी सुने ही न। आपने तो उसकी सारी बात सुन ली, पर वो आपकी बात सुनने को तैयार नहीं थी। फिर तीसरा आपने कहा कि नाम भजन करना। फिर उसने सवाल किया कि दवा खाएँ कि नहीं। आप दवा के लिए कभी मना नहीं करते। आपका मानना है कि यह काम तो मूर्खों वाला है। तो यह हाल कोई एक माई का नहीं है, सबका यही हाल होता है। समस्या बताते हैं तो आप ध्यान से सुनते हैं; पर जब आप उसका हल बताते हैं तो वो सुनने को तैयार नहीं होते हैं और आपका कीमती समय नष्ट करते हैं।


जब आप किसी धर्मस्थान पर जाते हैं

आपने सभी धर्मस्थानों को देखा है। कहीं-कहीं आप यह देखने के लिए चुपके से चले जाते हैं कि देखता हूँ कि वहाँ क्या-क्या चल रहा है। कहीं पर बलि के नाम पर रोज़ हज़ारों जीवों की हत्या की जाती देखी, कहीं कुछ। खैर, यह तो धर्म के नाम पर हो रहे पाप की बात हुई,

ऐसे हैं आपके काम

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पर आप जिस भी धर्मस्थान पर गये, वहाँ आप की बात हुई। यदि शिवजी के स्थान पर गये तो शिवजी से बात की, यदि हनुमान जी के स्थान पर गये तो उनसे बात की, यदि माता के स्थान पर गये तो उनसे बात की, यदि गंगा जी के पास गये तो उनसे भी बात की। यह सब वहाँ मौजूद होते हैं, पर आम आदमी तो ऐसे ही वापिस आ जाता है, वो बात करना नहीं जानता। पर आप सबसे बात करते हैं।


ऐसे हैं आपके काम

जम्भाल जी कहते हैं कि साहिब मेरा नौकर है। एक समय डोडा में कर्फ्यू लगा था और वे भी वहाँ थे। वे सड़क पर खड़े थे। एक आदमी को वहाँ खड़े डी. एस. पी. ने चाँटा मारा, कहा कि यहाँ क्यों खड़े हो! जम्भाल जी ने सोचा कि मेरी भी बारी आई। पर डी. एस. पी. ने उनके पास आकर कहा कि आपको कहाँ जाना है? जम्भाल जी ने कहा कि उधमपुर। डी. एस. पी. ने कुछ न कहा; वो आगे चला गया। इतने में एक मोटरसाइकिल वाला वहाँ आया। डी. एस. पी. ने उसे रोका, पूछा कि कहाँ जा रहे हो? उसने कहा कि उधमपुर। उसने जम्भाल जी के लिए कहा कि उन्हें भी साथ लेते जाओ। ये थे आप। जब उधमपुर आया तो मोटरसाइकिल वाले ने कहा कि उतरो। फिर कहा कि अच्छा जाना कहाँ है? जम्भाल जी ने कहा कि आगे तक। उसने कहा कि मुझे भी जाना है,

कोई वर्णन नहीं कर सकता है

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बैठो। कटड़े पहुँचे तो फिर उसने कहा कि यहाँ उतर जाओ। फिर खुद ही कहा कि अच्छा जाना कहाँ है? जम्भाल जी ने कहा कि अखनूर तक। वहाँ पहुँच गये। उसने कहा कि उतरो। फिर कहा कि अच्छा जाना कहाँ है? जम्भाल जी ने कहा कि बी. एस. एफ. के क्वार्टर तक। वहाँ पर पहुँचे तो कहा कि कितना दूर तक है? जम्भाल जी ने कहा कि आपका रास्ता दूसरा है, मेरा घर थोड़ी दूर है। मोटरसाइकिल वाले ने कहा कि घर छोड़कर आता हूँ। वहाँ पहुँचने पर उसने जम्भाल जी से कहा कि तुम चीज़ क्या हो, मैं तो तुम्हें छोड़ ही नहीं पा रहा था। मैं ऐसा हूँ ही नहीं। .....यह थे आप। आप ऐसे ही काम करते हैं। यह कोई एक नामी के साथ होने वाला किस्सा नहीं है और एक-दो बार होने वाला किस्सा भी नहीं है। राजू सरदार तो कहते हैं कि उनके साथ इतने करिश्में हो चुके हैं कि उन्हें याद भी नहीं हैं।

यह तो सत्य है कि आप पग-पग पर साथ देने के लिए तैयार रहते हैं। शर्त है कि श्रद्धा हो, विश्वास हो।


कोई वर्णन नहीं

कर सकता है

यदि कोई चाहे कि वो आपके गुणों का वर्णन करें तो निसंदेह यह नहीं हो पायेगा। वो वर्णन अधूरा ही रहेगा। अंत में उसे यही कहना होगा कि आप बहुत अच्छे हैं, आप बहुत ही निराले हैं। आपके गुणों का

ज़रूरत पड़ने पर मुर्दों में भी प्राण फूँकते हैं आप

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वर्णन करते-2 वाणी मौन हो जायेगी और वो शब्द नहीं मिल पायेंगे, जिनसे आपके गुणों का पूरा-पूरा वर्णन किया जा सके। सबसे पहले तो आपको कोई पूर्ण रूप से जान ही नहीं पायेगा। यदि कुछ जाना भी तो उसे वाणी में प्रकट नहीं कर पायेगा। यदि किया भी गया तो वो पूरा-पूरा, सही-सही वर्णन नहीं होगा, केवल उसका संकेत मात्र ही हो पायेगा।

ज़रूरत पड़ने पर मुर्दों में भी प्राण फूँकते हैं आप

आपने कई बार मरे हुओं को जीवित किया है, पर आप यह काम तमाशे के लिए नहीं करते। यही कारण है कि दुनिया को इन बातों की ख़बर नहीं हो पाती है। यदि कोई सिद्ध छोटा-सा करिश्मा दिखाता है तो दुनिया बांवरी होकर उसके पीछे भागने लग जाती है। वो तो शोहरत कमाने के लिए ऐसा करता है। क्योंकि उसके पास आत्मज्ञान नहीं है, यह सब ही है। वो तमाशे ही दिखाकर लोगों को इकट्ठा करेगा। जिसके पास जो है, वो दिखाना चाहता है, दूसरों को भी देना चाहता है। इसलिए महापुरुष ये काम नहीं करते, बल्कि वे आत्म ज्ञान द्वारा लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। उनके पास परम सिद्धि आत्मज्ञान होता है।

ये जो करिश्मे हैं, ये आप सहज में कर देते हैं। इनका दिखावा नहीं करते हैं आप। ये तमाशे आप दुनिया तक नहीं पहुँचाना चाहते हैं। ये तो केवल कभी ज़रूरत पड़ने पर आप मजबूरी में कर दिया करते हैं। आप तो अपने ज्ञान को ही दुनिया तक पहुँचाना चाहते हैं ताकि आत्मा का कल्याण हो सके। बाकी इन चमत्कारों को दिखाने वालों की पहुँच ही यहीं तक होती है तो वो बेचारे भी क्या करें, यही सब दिखायेंगे।

आप यह सब तब करते हैं, जब कोई मजबूरी हो और वो भी बिना दिखावे के। उदाहरण के लिए जब आपके एक नामी की करंट लग जाने से मृत्यु हो गयी तो सबने आपसे कहा कि वो चला गया है, लोग बातें करेंगे कि साहिब बंदगी का था। आप दुनिया की चिंता ही नहीं करते

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हैं। आपने कहा कि जाने दो, फिर क्या है, सबको जाना है एक दिन। पर आपके ट्रस्टियों ने बार-बार आग्रह किया तो आपने विचार किया। जब आपको लगा कि इसकी अभी यहाँ पर ज़रूरत है तो ही आपने मजबूरी में उसमें प्राण फूँके।

यह एक की बात नहीं है, सैंकड़ों की बात है। पर यह काम आप बड़े चुपके से कर देते हैं। जब भी किसी में प्राण फूँकते हैं तो फिर उसे बता देते हैं कि अब बहुत ही सावधानी से काम करना, तुम्हें पुनर्जन्म मिला है; यदि कुछ गलत किया तो मैं भी भागीदार हो जाऊँगा।

मस्तगढ़, जम्मू के पंडित प्रभु दयाल जी ने पीलिया की बीमारी में प्राण त्याग दिये। उन्हें आप-ही-आप दिखने लगे। तब उनके पार्थिक शरीर को लेकर राँजड़ी लाया गया। सुबह के 5 बजे थे। उन्हें एक कुल्ले में लिटाया गया। जब आपने द्वार खोला तो उनका बेटा सामने था। आपने उससे पूछा कि आज इतनी सुबह कैसे आना हुआ; पंडित जी कहाँ हैं? तब वो अपने पिता जी को आपके समक्ष लाया। आपकी नज़र पड़ते ही उनके शरीर में प्राण वापिस आ गये। आपने पंडित जी से कहा-अरे पंडित जी! आप तो चले गये थे। वे आपके चरणों पर गिर पड़े; बंदगी की और रोने लगे। तब आपने उन्हें प्रसाद दिया और बहुत कुछ समझाकर घर भेज दिया।

नौग्राम की रक्षा बहन जी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। बीमारियों के कारण उनका शरीर छूट गया। हार्ट की भी उन्हें तकलीफ़ थी और अन्य छोटी-छोटी बीमारियाँ भी थीं। घर वाले उनके पार्थिक शरीर को लेकर आपके पास आए। आपने कहा कि अभी तो इनकी ज़रूरत है। तब आपने उनमें प्राण फूँके और फिर समझाया कि इस शरीर से अब कोई गलत काम नहीं लेना; इसे मेरा ही मानना; आपने तो छोड़ दिया था।

इसके अलावा हज़ारों लँगड़ों, हज़ारों पागलों को आपने ठीक किया है। अन्य भी कई बीमारों को, जो किसी डाक्टर के इलाज़ से ठीक नहीं हो पाए होते हैं, उन्हें भी अच्छा किया है। पर यह काम आप इतने चुपके से करते हैं कि वो ख़बर फैल नहीं पाती है। यह इसलिए करते हैं

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कि यदि यह ख़बरें फैलने लगेंगी तो आपके पास फिर लाशें ही पहुँचेंगी। फिर तो राँजड़ी में भक्त लोगों को आपके दर्शन भी दुर्लभ हो जायेंगे। वैसे तो आप सहज में सबसे मिल लेते हैं, पर ऐसे में आपके दर्शन करना सच्चे भक्तों के लिए बड़ा मुश्किल काम हो जायेगा। इसलिए आप यह स्थिति उत्पन्न नहीं होने देना चाहते हैं।

सच तो यह है कि आपको इसके लिए किसी करिश्मे की भी ज़रूरत नहीं है। आप एक पर्दा करके संसार में चल रहे हैं। यदि आप केवल यह पर्दा हटा देंगे तो सब आपमें लय हो जायेंगे। कोई पंथ, कोई मत-मतान्तर नहीं रह जायेगा, सब आपमें लय हो जायेंगे। केवल आपका पंथ ही रह जायेगा। पर यह काम भी आप नहीं करना चाहते हैं। क्योंकि फिर तो सभी मुक्त हो जायेंगे। इसलिए आप युक्ति-युक्ति द्वारा जीवों के कल्याण का काम करना चाहते हैं। अपने ज्ञान द्वारा लोगों को अपनी ओर खींचना चाहते हैं, ताकि श्रद्धावान और साहिब के अंकुरी जीव सत्य भक्ति में आ सकें।

मुर्दे को जीवित तुम करके,
देते जीवन दान हो।
जग में जीवन सादा जीते,
तनिक भेद अपना न देते।
कोई न समझे कोई न जाने,
गुप्त सब तेरे काम हो॥
सुन भक्तों की दीन पुकार,
हरते उनके दुख अपार।
पल-पल रक्षा तुम हो करते,
काल की दुनिया से छुड़ा,
ले जाते अपने धाम हो॥
तुम्हारा भेद तुम ही जानो,
सब में तुम रहे समानो।
कहाँ लग कहें कुछ कहा न जाय,
धन साहिब तेरे काम हो॥

कोई समझे प्रेम दीवानी है

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कोई समझे प्रेम दीवानी है


समझ समझ कोई समझ कहानी,
आत्म हुई दीवानी है।
सुर नर मुनि त्रिदेव नहीं,
साहिब यह नूरानी है॥

न इसका कोई संगी साथी,
न इसकी कोई रानी है।
मात गर्भ में यह नहीं आता,
कहती संतन वाणी है॥

आता जो जन शरण में इसकी,
पाता अमर निशानी है।
चाम महल में यह नहीं रहता,
बोले मधुमय वाणी है॥

सबसे न्यारा साहिब है यह,
अद्भुत बड़ी कहानी है।
प्रेम नगर का है यह राजा,
कोई समझे प्रेम दीवानी है॥

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पुस्तक सूची

हिन्दी में

  1. परा रहस्या
  2. मासिक पत्रिका सत्यकेतु
  3. पावन प्रार्थनाएँ
  4. सद्गुरु चालीसा
  5. वार्षिक डायरी
  6. सद्गुरु भक्ति
  7. कहाँ से तू आया और कहाँ तुझे जाना रे?
  8. सत्संग सुधारस
  9. नाम अमृत सागर
  10. अमृत वाणी
  11. सद्गुरु नाम जहाज़ है
  12. चल हंसा सतलोक
  13. कोटि नाम संसार में तिनते मुक्ति न होय
  14. मूल नाम गुप्त है, जाने बिरला कोय
  15. गुरु सुमिरै सो पार
  16. तीन लोक से न्यारा
  17. सेहत के लिए ज़रूरी
  18. सहजे सहज पाइये
  19. रोगों से छुटकारा
  20. सद्गुरु महिमा
  21. भक्ति के चोर
  22. अनुरागसागर वाणी
  23. भक्ति सागर
  24. हरि सेवा युग चार है, गुरु सेवा पल एक
  25. सत्य नाम के पटतरे उबरे पतित अनेक
  26. काग पलट हंसा कर दीना
  27. कस्तूरी कुण्डल बसै मृग खोजे बन माहिं
  28. गुरु पारस गुरु परस है
  29. गुरु अमृत की खान
  30. शीश दिये जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान
  31. मूल सुरति
  32. भृंग मता होय जिहि पासा, सोई गुरु सत्य धर्मदासा

112 साहिब बन्दगी

  1. मैं कहता हूँ आँखिन देखी

  2. गुरु संजीवन नाम बतावे

  3. नाम बिना नर भटक मरे

  4. रोगों की पहचान

  5. यह संसार काल को देशा

  6. न्यारी भक्ति

  7. साहिब तेरी साहिबी सब घट रही समाय

  8. जाप मरे अजपा मरे अनहद भी मर जाए

  9. आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में

  10. सुरति समानी नाम में

  11. सबकी गठरी लाल है, कोई नहीं कंगाल

  12. निराले सद्गुरु

  13. कुँजड़ों की हाट में हीरे का क्या मोल


सन्तो सो सतगुरु मोहे भावे, जो आवागमन मिटावै।
द्वार न मूदे पवन न रोके, न अनहद उरझावे॥