निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 10, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त। [पृष्ठ ६]
मिलित होकर प्रतीत हों, और उन धातुओकी क्रियाओ का उसके अर्थमें सम्बन्ध भी हो, तो उस शब्दका निर्वचन अनेक धातुओंसे एक साथही करना— ऐसा ही वार्तिककार ने कहा है:— “यावतामेव धातूनां लिङ्ग रूढिगतं भवेत् । अर्थश्चाप्यभिधेयस्य-स्तावद्भिर्गुणविग्रहः” जितने धातुओका लिङ्ग ( चिन्ह ) रूढि शब्दमें पाया जाय, और अभिधेयमें उनका अर्थ हो, उतने ही धातुओसे उसकी व्युत्पत्ति करना । यदि धातुके अक्षर रूढि शब्दमें हों, और उसकी क्रिया उसके वाच्यया अर्थमें न हो, तो उस धातुसे उस रूढि शब्दका निर्वचन ( व्याख्यान ) न हो सकेगा । देखो, निगमन समाहनन और समाहरण तीनो ही क्रियाएं गमे आदि शब्दोंमें ( जो निघण्टु शब्दके वाच्य हैं ) विद्यमान हैं, उनके वाचक, 'गम्' 'हन्' और 'हृ' धातु निघण्टु शब्दके निर्वचन करनेके समय अहम्पूर्विकासे आगे बढकर कहते हैं कि-मेरे समान है, मुझसे इसका निर्वचन कर, मुझसे इसका निर्वचन कर । यहां निघण्टु शब्दमें 'गम्' धातु अपने गकारको घकार रूपमें देखता है, तथा 'हन्' और 'हृ' धातु अपने हकारको घकार बना हुआ देखते हैं । इसी कारणसे अनेक धात्वर्थों द्वारा निघण्टु शब्दका निर्वचन किया गया है कि ऐसे ही अन्यनामोंका निर्वचन कर लिया जाय । समाम्नायका अर्थतत्व । समाम्नाय शब्दका पर्याय ( समानार्थक ) निघण्टु शब्द है, तथां निघण्टु शब्द, जो पर्यायके प्रसङ्गमें आया हुआ है, उसकी इस