भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1151

हिन्दी निरुक्त ( ३८८ ) ११ अ० १ पा० ४ खं० अथ एषा अपरा भवति चन्द्रमसो वा एतस्य वा- ॥ ४ ॥ अर्थः—"सोमं मन्यते०" इस ऋचा का सूर्या (सूर्य- की पत्नी) ऋषि है विवाह में विनियोग है । 'यत्' जो कि- रासायनिक लोग 'सोमम्' 'ओषधिम्' सोम ओषधिको 'सम्पिषन्ति' पीसते हैं, 'पपिवान्' और पीते हैं, तथा पीकर 'मन्यते' मानते हैं कि- 'सोमंपपिवान्' हमने सोम पान किया है (वे सोम के पान करने वाले नही हैं और वह सोम भी वृथा हैं)। (इस प्रकार यह आधी ऋचा विधिविहीन निचोड़े हुए सोम को असोम कहती है )। कहो ! कौन सोम है ? और कौन सोमपा हैं ? इसके उत्तर में आधी ऋचा कहती है- सोमं यं ब्रह्माणो विदुः" जिसे ब्राह्मण लोग विधि के अनुसार यज्ञ में उपयुक्त हुए को सोम जानते हैं या मानते हैं (वह सोम है और उसके पान करने वाले सोमपी हैं)। "न तस्य अश्नाति कश्चन अयज्वा" किन्तु यजमान के रूप में यज्ञ में अधि- कारी न होकर उसे कोई पुरुष अशन नहीं करसकता = पी नहीं सकता यह मन्त्र का अधियज्ञ व्याख्यान है । अब अधिदैवत व्याख्यान है-पहिले कहा है कि-अथवा यह चन्द्रमा की है, उसी के दिखाने के लिये कहते है- "सोमं०-० ओषधिम्०" (यह यजुः है) अर्थात् : जो यजन करनेवाले यज्ञमें सोम ओषधिको निचोड़ते हैं और उसे पान करते हैं, तथा मानते हैं कि हमने सोमपान किया