निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1167, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४०४ ) ११ अ० १पा० १२खं० 'कलशः' कस्मात् । कला अस्मिन् शेरते मात्राः । 'कलि'श्च 'कला'श्च किरतेः विकीर्णमात्राः ।१२। इति एकादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥११,१॥ अर्थ ः—"सोमस्य राज्ञः०" इस ऋचा का विश्वा- मित्र ऋषि है । “सोमस्य राज्ञः धर्मणि (कर्मणि) सोम राजा के कर्म में प्रवृत्त होता हुआ, “वरुणस्य, बृहस्पतेः, अनु- मत्याः उ (च) शरणे (आश्रये)” वरुण, बृहस्पति और अनुमति के आश्रय में वर्त्तमान “ हे मघवन् ! तव, हे धातः ! विधातः ! युवयोश्च उपस्तुतौ (वर्त्तमानः) अहम् कलशान् अभक्षयम्” हे मघवन् ! इन्द्र ! तेरी और हे धातुदेव ! और हे विधातृदेव ! तुम दोनों की उप- स्तुति में वर्त्तमान रहकर मैंने ( तुम्हारी सबकी प्रेरणासे प्रेरित होकर ) सोम के कलश पान किये हैं । 'कलश' क्यों ? 'कलाः अस्मिन् शेरते' इस में सोमकी कुछ कला या मात्राएं सोम निकाल लेने पर भी बनी रहती हैं । 'कल' शब्दसे पूर्व भाग और शयन अर्थमें 'शीङ्' (अदा०आ०) धातु से उत्तर भाग है । 'कलि' और 'कला' दोनों शब्द विक्षेप अर्थ में 'कॄ' [तु०प०] धातु से हैं । क्योंकि—'कलि' या कलह में परस्पर में वचनों का विक्षेप होता है, और कला (मात्रा) भी किसी समुदाय से विक्षिप्त (फेंकी हुई) जैसी होती है । इति हिन्दीनिरुक्ते एकादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥११, १॥