भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 122

कि—मनुष्यकी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति होती है, उसका विशेष रूपसे निश्चय नहीं होता । सुतराम् इस शास्त्रके विना पदा- र्थकी प्रतीति अथवा वाक्यार्थकी प्रतीति नहीं होती । पूछें कि-पदार्थ और वाक्यार्थका क्या विशेष है ? ता कहेंगे कि-पदार्थ साकाङ्क्ष और वाक्यार्थ निराकाङ्क्ष होता है। एक पदार्थ के ज्ञान हो जानेपर दूसरे पदार्थ के ज्ञानकी अपेक्षा बनी रहती है, यही पदार्थ साकाङ्क्षता है। और वाक्यार्थ के ज्ञान हो जानेपर फिर अन्य अर्थ के जाननेकी कोई आकाङ्क्षा नहीं रहती, सुतराम् वाक्यार्थ के ज्ञान होते ही पुरुषकी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति हो जाती है। यही वाक्यार्थकी निराकाङ्क्षता है। जैसे—किसोने “गौः” ऐसा पद कहा तो फिर आकाङ्क्षा होती है कि—क्या ? उसके अनन्तर “गच्छति” ऐसा कहते ही उसको आकाङ्क्षा शान्त हो जाती है। इसी प्रकार “गच्छति” कहने पर “कः” यह आकाङ्क्षा होती है, वैसे ही “गौः” ऐसा कहते ही निराकाङ्क्षता हो जाती है। प्रयोजन यह निकला कि—“गौर्गच्छति” ( “गौ जाती है” ) ऐसा वाक्य बोलनेसे 'गौ' वहन-दोहन आदि क्रियाओंसे पृथक् होकर गमन क्रियामें अवस्थित प्रतीत होती है। और गमन क्रिया भी अन्य अश्व आदिकोंसे अलग होकर गौमें ही अवस्थित हुई प्रतीत होती है। अर्थात् “गौः” ऐसा कहनेसे गौका बोध तो हो जाता है, किन्तु वह जाती है, या चरती है अथवा वहन-दोहन आदि क्रिया करती है, कुछ पता नहीं चलता ? जब “गच्छति” ( जाती है ) कह देते हैं, तो अन्य सब क्रियाओंके सन्देह निवृत्त हो जाते हैं और गमनमें ही निश्चय हो जाता है, एवम् “गच्छति ( जाता है ) ऐसा कहनेसे घोड़ा जाता है या गौ जाती है अथवा मनुष्यादि कुछ निश्चय नहीं होता, किन्तु उसके साथ “गौः” यह पद बोलते ही जानेवालों

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य) · पृष्ठ 122, कुल 1282 में से · BharatKosha