भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 133

१३४ अ० १ पा० ५ सू० १ । कृपा से निर्विघ्न पीड़ारहित संस्कृत होकर वे यज्ञकर्ममें विनियुक्त हों। इसलिये मंत्रोंके अर्थोंमें कोई अनुपपत्ति नहीं है। ४-जोकि—यह कहा कि—हिंसा करता हुआ भी कहता है कि—“स्वधिते मैन ्र ति ्र सीः” इसपर कहना यह है कि-वेद- वाक्यसे यह अहिंसा प्रतीत होगी। प्रश्न होता है कि—प्रत्यक्षमें छेदन कर्म हिंसा है वह कैसे अहिंसा होसकती हैं ? सुनो;—‘यह अहिंसा है’ और यह हिंसा’ यह आगमसे प्रतीत होता है। और सम्पूर्ण आगमोंमें वेद ही प्रतिष्ठित आगम है, क्योंकि—सब अंग वेदसे ही निकले हैं। इसलिये वेदमें जिस छेदनादि क्रियाका विधान है, वह हिंसा नहीं कही जासकती। इन सबका यह अभिप्राय है कि—वेदवाक्य, जो धर्मका प्रथम बतानेवाला है, उसीसे हिंसा और अहिंसाका पता चलेगा, जिसको वह हिंसा कहे वह हिंसा है,और जिसको अहिंसा कहे,वह अहिंसा। जबकि—हिंसा-अहिंसाका निर्णता वेदही छेदनादि क्रियाका विधान करता है तो उसको हिंसा नहीं समझना चाहिये। जैसे कि कहा है,— “या वेदविहिता हिंसा न सा हिंसा प्रकीर्त्तिता” अर्थ—‘जो हिंसा वेदमें विहित है वह हिंसा नहीं है।’ क्योंकि— वैदिक आगम सारे ही जगत्के किसी एक उत्तम कल्याणके लिये उद्यत हुआ है, वह कैसे किसी प्राणीके अनिष्टके लिये विधान करता, इसलिये उसने जो कुछ किसी प्राणीके लिये छेदनादि कहा है, वह उसकी उत्तम गतिके लिये ही है। किञ्च ओषधि, वनस्पति, पशु, मृग, पक्षी, तथा सरीसृप सब, यज्ञमें भले प्रकार उपयुक्त होकर उत्कर्ष को प्राप्त होते हैं। वह उनकी हिंसा नहीं, लाभ है।

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