निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें४ २ अ० १ पा० १ खं० । न हो कि—निर्वचन न करे; क्योंकि—ऐसा न होने पर निरुक्त- शास्त्र अनर्थक ही रहेगा; किन्तु ऐसा न हो! इसीसे यह कहा है, कि—“जिन शब्दोंमें व्याकरणके नियम (सूत्र) नहीं घटते हों, उनमें उनका आदर न करे”। तो फिर क्या करे? अर्थ-सामान्य या शब्द सामान्यको लेवे। जैसे कि—‘प्रवीण’ ‘उदार’ और ‘निख्रिंस’ शब्द, अपने अभिधेय (स्वभाव प्राप्य) अर्थके सम्बन्धको छोड़कर, क्रियाके सामान्य रूप हेतुको ही लेकर अन्य ही अर्थोंमें रहते हैं। यथा—“प्रकृष्टो वीणायां प्रवीणो गान्धर्वे”— ‘प्र’ और ‘वीणा’ इन दो शब्दोंसे ‘प्रवीण’ शब्द बना है। जिस- का मुख्य अर्थ यह हो सकता है कि—वीणाके बजानेमें बहुत अभ्यासी है; अथवा गन्धर्व शास्त्रमें बड़ा चतुर या योग्यतावान् है। किन्तु यह शब्द अपने गन्धर्व-पाटव-रूप मुख्य अर्थ को छोड़ कर, केवल अभ्यासके पाटव या चतुराईको लेकर सभी जगह प्रवृत्त हो गया है। अर्थात् ‘जो पुरुष जिस कर्ममें कुशल है, वही ‘प्रवीण’ शब्दसे बोला जाता है’। जैसे ‘प्रवीणो व्याकरणे’ व्याकरणमें प्रवीण है। ‘प्रवीणो निरुक्ते’ निरुक्तमें प्रवीण है। तात्पर्य यह है कि—इस शब्दने अपने मुख्य अर्थमेंसे गांधर्व- विद्याके सम्बन्धको छोड़ दिया है, और वे भाग अर्थात् अभ्यास- पाटव, जो अन्य अन्य स्थानोंमें भी है, ले लिया है। जो अर्थ का भाग अनेक स्थानोंमें मिलता है, उसीको अर्थ का सामान्य या साधारण भाग कहते हैं, अर्थ सामान्यसे निर्वचनके स्थानमें इस बात पर ध्यान रखना चाहिये। ऐसे ही ‘उदार’ शब्द है, यह शब्द ‘उद्’ और ‘आर’ शब्दसे बना है। उद्का अर्थ ‘उद्गत’ है, चला गया या दूर हो गया, अथवा उड़ गया। ‘आर’ नाम उस लोहेके काँटे १ है, जिसे गाड़ी-