भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 175

हिन्दी निरुक्त । ७ इसी प्रकार व्याकरणमें अर्थके अधीन शब्दका विपर्यय भी होता है—"प्रत्तम् अवत्तम्-इति धात्वादावेव शिष्येते" • इत्यादि । डुदाञ् दाने (जुहोत्यादि) धातु और 'प्र' उपसर्ग दोनोसे 'प्रत्त' शब्द बनता है। यहाँ पर 'द्-आ' (दा) धातु है, उससे परनिष्ठा प्रत्ययका 'त' कार है वहां "दोद्दद्घोः" (पा० ७, ४, ४६) इसकी अनुवृत्ति लेकर "अच उपसर्गातः" (पा० ७, ४, ४७) से 'आ' का 'त' कार बन जाता है। "झरोझरि सवर्णे" (पा० ८, ४, ६५) सूत्रसे धातुके अन्त तकारका लोप होजाता है। "खरि च" (पा० १, ४, ५५) सूत्रसे 'द्' कारका 'त' कार होने पर "परः संनिकर्षः संहिता" (पा० १, ४, १६) सूत्रसे धातुका तकार प्रत्ययके तकारसे मिल जाता है, जिसकी "हलोनन्तराः संयोगः" (पा० १, १, ७) सूत्रसे संञ्जा होती है। फिर प्रादि समास होने पर "प्रत्त' यह शब्द बनता है। इसी प्रकार 'दो अवखण्डने' धातुके आदिमें 'अव' उप- सर्ग जोड़ देनेसे 'अवत्त' शब्द बनता है। यहाँ पर 'द्' और 'ओ' धातु है, उसके 'ओकारका आकार' बनजाने पर त भाव लोप- त-पर अक्षरमें मिलना तथा प्रादि समाप्त यह सब संस्कार पहिले शब्दके समान ही होते है। जिस प्रकार इन दो धातुओंके आदि वर्ण ही शेष रहते हैं, ऐसे ही और शब्दोंमें भी और और धातुओंके अक्षरोंके परिवर्तन आदि प्रक्रिया जानी जा सकती है। इन 'प्रत्त' और 'अवत्त' दो उदाहरणोंमें वैयाकरणोंकी प्रक्रियाके देखनेसे प्रतीत होगा, कि—वे छोटे छोटे एक एक शब्दके लिये तोड़ फोड़ लगाते हैं, यह केवल उनकी इच्छानुसार शब्दकी व्युत्प- त्तिके लिये कल्पित उपाय ही है, वह कोई नियत धर्म नहीं है कि- और वैयाकरण या नैरुक्त भी इन शब्दों या और शब्दोंमें इन्हींकी चाल पर व्युत्पत्त करें, किन्तु इनके समान औरोंको भी इस कार्यमें स्वतन्त्रता है, कि—वे जिन शब्दोंमें उनकी व्युत्पत्तिके अनुसार जो