निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १७ वह गुणभूता है, और उसका भाव सिद्धिसे ही परोक्ष होने पर अनुमान होता है । क्रियाकी परोक्षता । इन्द्रियोंमें किसी इन्द्रियसे भी अपने स्वरूपमें रहती हुई क्रिया भी प्रत्यक्ष नहीं होती। किन्तु उसके अन्तमे जो भाव सिद्धि होती है, उस से वह अनुमित होती है-(अनुमान) निश्चय ही क्रिया हो चुकी, जिससे कि यह भाव सिद्ध हो गया । यदि क्रिया न होचुकी होती तो जैसे कि-पहिले इस क्रियाके बिना यह भाव कभी नहीं हुआ था, ऐसे ही अब भी नहीं होता, और अब यहां भाव है, इससे क्रिया होचुकी, यह अनुमिति होती है । फलितार्थ । यद्यपि आख्यात क्रिया और भाव दोनोंका वाचक है, तथापि भाव के ही लिए क्रिया होती है, इससे भावकी प्रधानता मानी जाती है । भाव-प्रधानताका व्याख्यान्तर । कोई आचार्य भावप्रधान शब्दका प्रकृत्यर्थ प्रधान अर्थ करते हैं । अर्थात्, आख्यातमें दो भाग होते हैं, प्रकृति और प्रत्यय, प्रकृतिका अर्थ जो भाव है वह प्रधान, और प्रत्ययका अर्थ जो साधन या कारक हैं, वे गौण रहते हैं । इस मतमें भाव, कर्म, क्रिया और धात्वर्थ एक ही वस्तु है । (यह व्याख्या पहिली व्याख्याका स्पष्टीकरणमात्र है) । व्युत्पत्ति । आख्यायन्ते स्त्रीपुन्नपुंसकानि, क्रियागुणभावेन वर्तमानानि अनेन, क्रिया च तेषामुपरि प्राधान्येन वर्तमाना-इत्याख्यातम् ॥ ३