भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

हिन्दी निरुक्त । २१ [ लोकमें—] 'अक्रूरो ददते मणिम्' 'अक्रूर मणिको धारण करता है'—ऐसा बोलते हैं। औपमन्यव आचार्य्य इस ( दण्ड ) शब्दको दमन क्रियाके सम्बन्धसे ( 'दम' उपशमे ( दि० प० ) धातुसे ) बना हुआ मानते हैं। [ लोकमें—] “दण्डमस्य आकर्षत”—हे सभा- सदो ! इसको दण्ड दो, ऐसा गर्हा या निन्दामें प्रयोग करते हैं ॥४॥ व्याख्या-- 'शवतिः'—कम्बोज नाम म्लेच्छ देशोंमे 'शवति' यह आख्यातकी क्रिया 'गच्छति'—( जाता है) के अर्थमें बोली जाती है, यह इस धातुका प्रकृति-रूप है। और आर्य्यदेश या हिन्दुस्थानमें इसी धातुके विकार भूत 'शव' नामसे मृतक शरीर ( मुर्दा ) बोला जाता है। इस प्रकार कोई देशोंमें प्रकृति और कोई देशोंमें धातुकी प्रकृति बोली जाती है, या कहीं चेतन, और कहीं अचेतन। कम्बोजाः—[ क-] 'कम्बलभोज' शब्दसे 'कम्बोज' शब्द बना है, क्योंकि—उन देशोंमें शीतके आधिक्यसे कम्ब- लको ओढ़ने, पहिननेमें बहुत लेते हैं; इसलिये कम्बलभोजसे ही कम्बोज बना होगा। [ ख-] अथवा 'कमनीयभोज' शब्दसे कम्बोज शब्दकी उत्पत्ति हुई। क्योंकि-उन देशोंके मनुष्य, कम- नीय—या उत्तम उत्तम वस्तुओंको उपभोग करते है। 'भुज' धातुके भोजन अर्थको लेकर काश्मीर देश कम्बोज कहा जा सकता है, क्योंकि—वहाँ अच्छे मेवे होते हैं। जिनको वहांके लोग खाते है। यदि उपभोग अर्थ लेवें तो कम्बोज उस देशका नाम हुआ, जिस समुद्रके अन्तरमें मोती आदि कमनीय रत्न पैदा होते हैं, जिसका- कि, अब भी कम्बोज नाम प्रसिद्ध है; क्योंकि-वहांके लोग कमनीय रत्नोंका उपभोग करते हैं।