भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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द्रव्य वाचक पदोंकी जो 'ओदनम्' इत्यादि हैं, सहायता नहीं ली जाती, अर्थात् 'ओदनम् पचति' ऐसा कहनेकी आवश्यकता न होती । केवल 'पचति' पदसे ही आकांक्षा पूर्ण हो जाती । भाव यह है कि-'पचति' पद क्रियाके बोधनके लिये किसी दूसरे पदकी अपेक्षा नही करता, किन्तु साधनोंके ही विशेष रूप जनानेके लिये ही 'ओदनम्' इत्यादि पदोंकी अपेक्षा करता है, इसीसे आख्यात क्रियाप्रधान है। अर्थात् जिस प्रकार पचति क्रिया कर्तृ, कर्म आदि कारकोंके विशेषरूपको बतानेमें असमर्थ होकर 'ओदनम्' 'देवदत्तः' इत्यादि द्रव्यवाचक शब्दोंकी अपेक्षा करती है, वैसे पाकरूप क्रियाके विशेषरूपके बोधन करनेमें किसी पदकी सहायताकी अपेक्षा नहीं करती, किन्तु स्वयम् आपही उस कार्यको पूरा कर देती है, जो जिसमें स्वतन्त्र है, वह उसमें प्रधान है, इसी न्याय पर आख्यातमें क्रियाकी प्रधानता स्थिर होती है । अथवा जब कोई किसीसे किसीकी क्रियाके ही जानने के लिए पूछता है कि-'क्या करता है ? तब उसके उत्तरमें वह उसकी क्रियाको 'पचति' (पकाता है) आदि आख्यात पदसे ही बताता है, किन्तु 'ओदनम्' (ओदनको देवदत्त) इत्यादि नाम पदोंसे कभी क्रियाके बतानेका उद्योग नहीं करता। यदि नाम, उपसर्ग या निपात इन पदोंमें से भी किसी पदसे क्रिया बताई जा सकती अथवा 'पचति' आख्यात पदसे क्रिया बताई ही नहीं जा सकती तो, नियम पूर्वक 'पचति' पदसे ही उसका सदा उत्तर न देता, किन्तु उत्तर जब देता है, इसी से देता है, और जहां द्रव्य या साधनोंकी जिज्ञासा होती है, तो उसका प्रयोग कभी नहीं किया जाता, जब कि-सर्वथा क्रियाके बोधन के अतिरिक्त कोई उसका कार्य ही नहीं है-तो उसको क्रिया प्रधान मानने के अतिरिक्त क्या कहा जावेगा ?