निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० २ अ० ७ पा० १ ख० । (खण्ड १) [ निरु० ] वाङ्नामानि उत्तराणि सप्तपञ्चाशत् । ‘वाक्’ कस्मात् ? वचेः । तत्र ‘सरस्वती’-इत्यस्य नदीवद् देवतावच्च निगमा भवन्ति । तद्-यद्- देवता वद्-उपरिष्टात् तद् व्याख्यास्यामः । अथ- एतद्-नदीवत्-॥ १ ॥ अर्थ । प्रकृत मेघके नामोंसे आगे सत्तावन (५७) वाक्के नाम हैं। ‘वाक्’ शब्द किस धातुसे है ? ‘वच्’ ( अदा० प० ) धातुसे । उनमें ‘सरस्वती’ इस नामके नदीके समान और देवताके समान निगम (वर्णनवाले मन्त्र) हैं । सो-जो देवताके समान हैं, उसे सोलहवें या ग्यारहवे अध्याय, “पावका नः सरस्वती” ( ऋ० सं० १, १, ६, ३) मन्त्रमें व्याख्यान करेंगे । और जो यह नदीके समान हैं, [ उसकी व्याख्या की जातो है ] ॥ १ ॥ व्याख्या । मेघोंमें ही वाक् या शब्द अधिक होता है, इस कारण मेघ- नामोंके अनन्तर वाक्के नाम कहे जाते हैं । वे ‘श्लोक’ ‘धारा’ ‘इला’ इत्यादि हैं । श्रूयते इति श्लोकः । श्रवण किया जाता है,- इससे ‘श्लोक’ है । ध्रियते तं तम्-अर्थम्-अवधारयितुम्-इति धारा । अर्थात् उस उस अर्थके अवधारण ( निश्चय ) करनेको धारण की जाती है, इससे ‘धारा’ है। त तम् अर्थ प्रति ईष्टे-इति इडा । अर्थात् उस उस अर्थके प्रति समर्थ' है, इससे इडा और ड-ल के अभेदसे ‘इला’ है। इसी प्रकार अन्य शब्दोकी व्याख्या करना होगा ॥ १ ॥