निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ ३ अ० २ पा० २ खं० । “तुम सब पञ्चजन या मनुष्य मेरे यज्ञको सेवन करो”। 'पञ्चजन' पाँच जने । ( क ) कोई आचार्य मानते हैं—गन्धर्व, पितर, देव, असुर और राक्षस ये पांच जने 'पञ्चजन' हैं। ( ख ) चार वर्ण और पाँचवाँ निषाद ये पाँच पञ्चजन हैं, यह उपमन्युका पुत्र मानता है। 'निषाद्' क्यों है ? 'इसमें पापकर्म बैठा हुआ है'—यह नैरुक्त मानते हैं। [ पञ्चजनके दूसरे निर्वचनमे निगम-] “यत् पाञ्चजनयया विशा”—[ऋ० सं ६, ४, ४३, १] अर्थात् “पाँच जातियोंमें बटी हुई मनुष्य जातिके सहित ऋत्विजोंने इन्द्रके न बरसने पर उसकी स्तुति की” इत्यादि । 'पञ्च' क्यो ? जिससे कि-वह पृक्त संख्या है, अर्थात् स्त्री, पुम्, और नपुंसक तीनों लिङ्गोंमें समान रूप रहती है। मनुष्य नामोंके अनन्तर बारह (१२) बाहुके नाम हैं। [क्योंकि ये मनुष्योंके ही होते हैं, इससे मनुष्य नामोंके अनन्तर कहे गये।] 'बाहु' क्यों ? जिससे कि—इनसे कर्मोंको बहुत बाधित करता है। बाहुके नामोंके अनन्तर अङ्गुलियोंके बाईस (२२) नाम हैं। 'अङ्गुलि' क्यों हैं? ये अग्रगामिनी या आगे चलनेवाली होती हैं। अथवा आगे करने वाली होती हैं। अथवा इनसे जिसे ताडन किया जाता है, वह अङ्कित जैसा हो जाता है। अथवा इनसे अभ्यञ्जन (मालिश) की जाती है इसीसे ये अङ्गुलि हो सकती है। उनके निर्वचनको करने वाली यह ऋचा है—॥२॥ व्याख्या । मनुष्योंके नामोंमें २३ वाँ 'पञ्चजन' एक नाम है, जिसका कि— इस खण्डमें 'तदद्य' यह निगम दिया गया है। कोई आचार्य मानते हैं कि—यह मनुष्य जातिसे अतिरिक्त पाँच जातियोंके समूह- को कहता है। जैसे ॰कि—गन्धर्व, पितर, देव, असुर और