निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 43, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ अ० १ पा० १ सू० २ । समय प्रकाशनीय शब्दके अक्षरोंके क्रमसे वहीं वहीं जाकर लगता है। जहांसे इसके अक्षर प्रकट होते हों, इसी रीतिसे वायुके साथ वक्ताका अभीष्ट शब्द उसके मुखसे बाहर निकल कर श्रोताके श्रोत्रेन्द्रियमें प्रवेश कर उसके आत्मामें भावनारूपसे जो वैसा शब्द स्थित है, उसको स्मृतिपथमें ले आकर उसका अर्थ श्रोता को प्रतीत होते ही अन्तर्धान हो जाता है, यदि शब्दकी पूर्णरूप में स्थिति न होती तो “घट मानय” आदि वाक्यकं श्रवणसे जो श्रोता घट ले आता है, वैसा क्यों होता ? ऐसा होनेसे ही शब्दों की गणना उनके परस्पर गौण मुख्य व्यवहार तथा धातुओंसे उपसर्गों वा प्रत्ययोंके योग और उनको आगम आदेश आदि विकार होते हैं, बुद्धिके द्वारा उन उन शब्दोंमें मानना सिद्ध होता है। शब्दके अनित्यत्वपक्षमें समाधान । अनित्यत्व पक्षमें भी पुरुषके प्रयत्नसे उत्पन्न होकर दूसरे को अर्थज्ञान कराके शब्दकी व्यक्तियोंका ही ध्वंस (नाश) होता है, किन्तु उनकी आकृति विद्यमान रहती हैं, वे अपनी अभिधान शक्तिसे बुद्धिके द्वारा अवस्थित होकर अपने अर्थोंको प्रकाशित करती हुईं स्थित ही रहती हैं। उनमें साक्षात् पदों की संख्या रहती है और वही संख्या विनाशिनी व्यक्तियोंमें लक्षणसे मान ली जाती है। इस लिए शब्दके व्याप्तिमान् होने से पद चतुष्ट्वादि सब समीचीन हैं। और वस्तुओंसे शब्दका प्रयोजन नहीं होता। (नि०) अणीयस्त्वाच्च शब्देन संञ्जाकरणं व्यवहारार्थं लोके । शब्दके समान चिन्ह, या इशारे भी अर्थके जनानेमें काम