निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( १० ) ४ अ० १ पा० १ ख० इस अध्याय के निघण्टुस्थ शब्दों की निरुक्तस्थ संक्षिप्त व्याख्या
| निघण्टु-स्थ सं० | अनेकार्थ | तत्व (अर्थ) अवगम | निगमः |
|---|---|---|---|
| ४६ | जामिः (४) | अतिरिक्त नाम। वालियाः। भगिनी।<br>असमानजातीयावा (पा० ३ख०४) | “यत्रजामयः कृणवन्नजामि” |
| ३६ | रजः (२) | रजतेः। ज्योतिः। उदकम्। लोकाः।<br>असृगहनी। (पा० ३ख०३) | |
| ४० | हरः (३) | हरतेः। ज्योतिः। उदकं। लोकाश्च<br>(पा = ३ख०३) | “अग्नेयत्तेहरः” |
| २६ | द्यतिः (१) | उपदाया दान विभाग दहन हिं-<br>सार्थः। (पा० ३ख० १) | (१) “नवेनपूर्वद्दयमानानाः” । २।३ “द्यएतच्छद्<br>विद्यते” (४) “दुर्वर्त्त भीमोद्यते” (५)<br>“विद्दुद्द्युद्द्यमानौविशञ्चन्” । |
| ४२ | व्यन्तः (४) | (अनेकार्थधातुप्रकृतिः) (पा० ३<br>ख०३) | “पदेषुदेवस्य नमसा व्यन्तः” । |
निपात