भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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६४ अ० १ पा० २ ख० १ ॥ जांय और निवचन किये जांय, तो व्याख्या-धर्म प्रदर्शित नहीं हो, इस कारण व्याख्या-धर्मके उपदेशार्थ कोई सम्पूर्ण पढ़े जाते हैं तथा निर्वचन किये जाते हैं, और शास्त्रके अति गौरवके भयसे कोई असंपूर्ण ही पढ़े जाते हैं । प्रत्येक मन्त्रमें ही जिस प्रकार सकल, आधा अथवा चौथाई पढ़नेसे प्रयोजन जाना जा सकता है, वह संक्षेपसे यह प्रकार है, कि— “जिस जिस मन्त्रमें जिस जिस एकार्थ, अनेकार्थ, तथा अनवगतसंस्कार पदको निर्वचन करता है, अथवा किसी शब्दान्तर का अध्याहार करता है, यद्वा किसी विशेष अर्थको दिखाता है, तथा कोई विपरिणाम करता है, या किसो सन्दिग्ध अर्थका निर्णय करता है, ऐसे प्रयोजनोंके लिये सकल मन्त्रका अध्ययन करता है, एवम् जिस मन्त्रमें आधे या चोथाई भागहीमे वैसा पद है, जिसका कि—आचार्यको निर्वचन करना अभीष्ट है, तो उतना ही पढ़ देता है, यह उक्त प्रकारसे निपुणताके साथ सर्वत्र अन्वेषण करना चाहिए । स्तुति वाक्य और स्मारक वाक्य । स्तुतिके लिये जिन वाक्योंका प्रयोग होता है, वे स्तुति-वाक्य कहलाते हैं, तथा स्मरणमात्रके लिये उपयोगी होनेवाले वाक्य स्मृतिवाक्य या स्मारक होते हैं । अर्थात् जिस वस्तुकी स्तुति करना हो, उसमें गुणोंका बखान करना, स्तुति वाक्यका प्रयोजन है, एवम् गुणोंके द्वारा अनुस्मरणीय वस्तुके स्वरूपका प्रकाश करना, स्मारक वाक्यका प्रयोजन होता है । या यो समझिए कि—स्तुति-वाक्य में विशेष्यके द्वारा बिशेषणोंका और स्मारक-वाक्यमें विशेषणोंके द्वारा विशेष्यका ज्ञान होता है । जैसे—"देवदत्तश्चतुर्वेदाऽभिज्ञः" ‘देवदत्त चारों वेदोंका जाननेवाला है’ यहां पहिले देवदत्तका ज्ञान