भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 830, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 830

हिन्दी निरुक्त ( ६० ) ७ अ० ३ पा० १० खं० व्याख्या । सप्तमाध्याय के आरम्भ से देवतातत्त्व के ही सम्बन्धमें विशेष २ अर्थों का निर्णय होता आया है । जैसे पहिले देव- ता का लक्षण कि किस पहिचान से मन्त्र में देवता समझा जावेगा । फिर जिन मन्त्रों में देवता ज्ञातव्य है उन मन्त्रों के परोक्ष, प्रत्यक्ष और आध्यात्मिक भेद बताए गए हैं, उन का भी प्रयोजन देवता का परिज्ञान ही है । क्योंकि भिन्न २ स्वभाव वाली ऋचाओं में भिन्न २ प्रकार से देवता रहता है, इससे उनके स्वभाव जाने बिना देवता परिज्ञानमें संकट उपस्थित हो सकता है। इसी प्रसंग में हीन लक्षण मन्त्र भी दिखाए, जिनमें कोई स्तुतिहीन है, कोई कामनाहीन है, कोई शापरूप है, और कोई शपथरूप है, इत्यादि । फिर अनादिष्ट मन्त्र अनेक मत भेदोंसे अनेक प्रकार के दिखाए हैं- जिनमें कोई देवता के चिन्ह से रहित होकर यज्ञ में सम्बन्ध करता है, कोई यज्ञाङ्ग में सम्बन्ध करता है, कोई दोनों में सम्बन्ध नहीं करता, उनमें यज्ञ देवता, यज्ञाङ्ग देवता, यज्ञ से अन्यत्र याज्ञिकों के मत में 'प्रजापति' देवता, नैरुक्तों के मत में 'नराशंस' देवता अथवा इच्छित देवता, अथवा अधि- कृत देवता, अथवा विश्वदेवता, अथवा यज्ञ देवता (आदित्य देवता) अथवा अग्नि देवता इत्यादि रूप से निर्णय किया है फिर अदेवताओं को देवताओं के समान स्तुति का आक्षेप और उसका देवता के माहाभाग्य आदि हेतुओं से प्रतिसमा- धान, फिर देवताओं की संख्या के सम्बन्ध में नैरुक्तों के मत में त्रित्व और याजकों के मत प्रतिनाम देवता का भेद (और आत्मवित् के मत में एक आत्मा देवता) स्थापन

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