भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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हिन्दी निरुक्त ( १४३ ) द० अ० २ पा० १ खं० अ० ५ ख० ? पद ०२) वैश्वानर (निघ० अ० ५ खं० १ पद ०३) द्रविणोदाः (निघ० अ० ५ खं०२ पद० १) ये चार शब्द व्याख्यान किये जाचुके हैं। दूसरे खण्ड के कुल १३ शब्दों में से 'इध्म' आदि बारह (१२) शब्द अवशिष्ट हैं, इनका 'आप्री' नाम प्रसिद्ध है, इसीसे आचार्य ने निघण्टु अ० ५ खण्ड २ में इध्म शब्द पर ही "अथात आप्रियः" यह अधिकार की सूचना दी है, ये बारह शब्द यहाँ निघण्टु ग्रन्थ में जिस क्रम से पढे हैं, उसी क्रमसे ⁜प्रैष ग्रन्थ = मन्त्रभाग के स्थल विशेष में भी पढ़े हुए हैं, अथवा वहाँ जिस क्रमसे ये शब्द पढ़े हैं, उसी क्रम से वहां से इस समाम्नाय में उठा लिये हैं, इस कारण इनके क्रम (सिलसिले) का प्रयोजन यहाँ वही है, जो वहाँ है, किन्तु इन 'इध्म' आदि शब्दों के क्रम पूर्वक उठाए हुओं का क्रम देखकर यह प्रश्न उठ आता है कि- क्या 'अग्नि' आदि जो और २ शब्द इस काण्ड में पढे हुए हैं, उनका वह क्रम निघण्टु में किसी प्रयोजन के साथ में होसकता है, या उनकी गणना ही जैसे तैसे अपेक्षित है ? यद्यपि 'इध्म' आदि आप्री देवताओं के नामों का

⁜ यह प्रैषाध्याय के नाम से ऋग्वेद मन्त्रसंहिताके परिशिष्ट भाग के अन्त में एक प्रकरण ग्रन्थ है। उसमें १३ प्रयाजप्रैष ८ पाशुक प्रैष ११ अनुयाज प्रैष एक सूक्त वाक प्रैष और ३६ सुत्या में सवनीय प्रैष हैं। इस प्रकार कुल वहां पर ६९ प्रैष मन्त्र हैं। इसी का नाम प्रैषग्रन्थ या प्रैषाध्याय है।