भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

हिन्दी निरुक्त । ६५ [ (३) पदपूरण ] क्रियावाचकमाख्यातमुपसर्गोविशेषकृत् । सत्त्वाभिधायकं नाम निपातः पदपूरणः ॥ कम्, ईम, इत् और उ,और कहीं कहीं इव य निपात गद्यग्रन्थोमे वाक्यपूरण और पद्य-ग्रन्थोंमें पदपूरण होते है । ये प्रायः अनर्थक होते है, अर्थवान् कदाचित् ही कही होते होगे ॥ कम्—पदपूरण—वेदे—१ निष्षक्रासश्चिद्विन्नरो भूरितोका वृकादिव । बिभ्यस्यन्तो ववाशिरे शिशिरञ्चोवनाय कम् ॥ २—मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कम् [ऋ० स० ८, ८, १६, १] { व्याख्या - कम् इति पदपूरण एव, } { जीवनाय कम् जीवनाथमित्यर्थ } [ आ-इम-ण्ण | ] योग्य) अर्थोंमे समान नही होते, किन्तु कोई पुरुष ऊहा, अपोहन, धारण और वक्तृत्वमें समर्थ होते है और कोई मेधा रहित होते हैं वे सच्ची बातोतक पहुचते नही । ये किस प्रकार परस्पर असमान है, यह दृष्टान्तसे प्रतिपादन करता है ।—कोई विद्वान् बुद्धिसे उस ह्रद (तडाग) के समान हैं, जिसमे मनुष्यके मुखके बराबर जल भरा हुआ है, कोई काखके समान जलवाले ह्रदके समान है, और कोई विद्वान् अपरिमित जलवाले तडागोके समान है, अर्थात् उनके प्रज्ञानका कोई प्रमाण नही है, वे ऐसे दिखाई देते हैं ।

  • आ-इम एनम् = एसनम् । आ ( आङ् उप० ) आमुखा अर्थ मे 'सन्नत' क्रियामें स युक्त हांगया, और 'णभ्' उसीका कर्मकारक है, तथा 'इम्' निरर्थक होकर पदपूरण मात्र करता है । , "शिशिरञ्चौवनाय कम्" इस उदाहरणका शेषभाग वृत्तिकारको सन्तोषदायक नही मिला इससे उन्होंने "गाथ्वान्तरंषु ग्रैषो दृष्ट्वा " ऐसा कर दिया है। जो कुछ