भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

हिन्दी निरुक्त । ६७ (४) निपात समाहार. नेत्—०—परिभये—वेदे—१ हविर्भिरेके स्वरितः सचन्ते (न+इत्) (सर्वतोभये) सुन्वन्त एके सवनेषु सोमान् । शचीर्मदन्त उत दक्षिणाभि र्ने ज्जिह्मा- यन्त्यो नरकम्पतामेति ॥ व्याख्या —नेत्—इति पदपूरण वय जिह्मायन्ता जिह्मम् आचरन्त्य भगवन्- } नरकं पताम नचेत्— अनुपृष्टेऽर्थे—लौके—नचेत् सुरां पिबन्ति (न+च+इत्) व्याख्या — { कोई किसीसे पूछता ह प्र० खड हैं शूद्र उ० खड़े हैं । अनु० प्र० खड हे तब क्यों नहीं आजाते पुन उ० नचेत् सुरा पिबन्त्यागमिष्यन्ति यदि सुरा नहीं पीते हैं तो आजायेंगे । क्योकि उसमे बहुत थोड़ा शीत होता है, उनमें हम सुखसे जीयेंगे” ॥ १ अमहीयु आङ्गिरस ऋषि । सोम देवता । गायत्री छन्द । ग्रावस्तुतिमं विनियोग है । हमारी गिरायें (वाणियें) उस सोमको, जो इन्द्रके हृदयमें लगता है, बढ़ावें, जैसे-एक बच्छेवाली बहुतसीं गौवें क्रम क्रमसे अपन अपन दुग्धोसे एक बच्छेका पोषण करती हैं। अर्थात् बहुत गौओंके और और बच्चे मर जानेपर कदाचित् उनका एक बच्छा ही जीता रहे और वे सब उसी वत्ससे अपना स्नेह कर लें । तथा उसे ही अपना अपना दुग्ध पिलाने लगें । १३