भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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१२२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- वृक्ष, कटा हुआ भी बढ़ जाता है, चन्द्रमा, क्षीण हुआ भी वृद्धि को प्राप्त हो जाता है, ऐसा सोचते हुए वे सज्जन विपत्ति से संतप्त नहीं होते हैं।

व्याख्या- मनुष्य को कभी भी विपत्तियों के आने पर दुःखी नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रकृति का शाश्वत् नियम है कि कभी भी एक जैसी स्थिति नहीं रहती। आप ही देखिए पेड़ को काटने का बाद भी वह फिर से उग आता है। ठीक इसी प्रकार चाँद भी एक बार धीरे-धीरे क्षीण होता है, किन्तु फिर से बढ़ जाता है, हमेशा एक सा नहीं रहता है। अतः सम्पत्ति और विपत्ति प्रकृति का नियम है।

विशेष- १. सुख और दुःख संसार का नियम है, अतः दुःख से व्यक्ति को घबराना नहीं चाहिए। २. व्यक्ति को धैर्य का आचरण करना चाहिए। ३. अन्यत्र भी कहा गया है- 'चक्रवत् परिवर्तन्ते सुखानि च दुःखानि च' ४. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है- लक्षण इस प्रकार है— यस्याः पादे प्रथमे, द्वादश मात्रास्तथा तृतीयेऽपि। अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥ ५. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √सम् + √तप् + झ (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) सन्तप्यन्ते २. √छिद् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) छिन्नः ३. √रुह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) रोहति ४. √क्षै + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) क्षीणः ५. उप + √ची + त (लट् लकार, आत्मने पद, प्रथम पुरुष, एकवचन) उपचीयते ६. वि + √मृश् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) विमृशन्तः ७. वि + √पद् + क्विप् (स्त्रीलिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन) विपदा

ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता शौर्यस्य वाक् संयमो,
ज्ञानस्योपशमः श्रुतस्य विनयो वित्तस्य पात्रे व्ययः।
अक्रोधस्तपसः क्षमा प्रभवितुर्धर्मस्य निर्व्याजता,
सर्वेषामपि सर्वकारणमिदं शीलं परं भूषणम्॥९४॥

अन्वय- सुजनता ऐश्वर्यस्य, वाक्-संयमः शौर्यस्य, उपशमः ज्ञानस्य, विनयः श्रुतस्य, पात्रे व्ययः वित्तस्य, अक्रोधः तपसः, क्षमा प्रभवितुः, निर्व्याजता धर्मस्य भूषणम् (अस्ति)। (किन्तु) सर्वकारणम् अपि इदम् शीलम् सर्वेषाम् परम् भूषणम् (अस्ति)।