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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 194 में से

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पृष्ठ 151

नीतिशतकम् १२९

११. कृत्वा + आखुः (अकः सवर्णे दीर्घः - आ + आ = आ)
१२. तेन + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)

यथा कन्दुक पातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि।
तथा त्वनार्यः पतति मृत्पिण्डपतनं यथा॥९८॥

अन्वय- यथा कन्दुक पातेन उत्पतति तथा आर्यः पतन् अपि (उत्पतति) तु यथा मृत्पिण्डपतनं (तथा) अनार्यः पतति।

अनुवाद- जिस प्रकार गेंद गिराने से ऊपर उठती है वैसे ही सज्जन (व्यक्ति) गिरते हुए भी ऊपर उठता है, किन्तु मिट्टी के ढेले पर गिरने के समान दुष्ट का पतन होता है।

व्याख्या- सज्जन व्यक्ति का पतन गेंद के गिराने के समान होता है, जिस प्रकार गेंद गिरकर भी पुनः उठती है वैसे ही सज्जन व्यक्ति की अवनति के बाद उन्नति सुनिश्चित है। इसके विपरीत दुर्जन व्यक्ति का पतन मिट्टी के ढेले के समान शाश्वत होता है। वह एक बार पतित होने के बाद पुनः उन्नति को प्राप्त नहीं होता।

विशेष- १. सज्जन व्यक्ति के पतन की तुलना गेंद के पतन से तथा दुष्ट व्यक्ति के पतन की मिट्टी के लोंधे के गिरने से की गई है।
२. दुष्ट व्यक्ति का पतन शाश्वत होता है, जबकि सज्जन व्यक्ति अवनति को प्राप्त करके भी उठता अवश्य है।
३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

श्लोके षष्ठं गुरुज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विः चतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥

४. दृष्टान्त अलंकार, लक्षण—

दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।

५. नीतिशतकम् की सभी पाण्डुलिपियों में यह श्लोक नहीं है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. उत् + √पत् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) उत्पतति
२. √पत् + शतृ = पतन्
३. न आर्यः इति (नञ् समास) = अनार्यः
४. मृतस्य पिण्डं मृतपिण्डं (षष्ठी तत्पुरुष) तस्य पतनं = मृत्पिण्डपतनं
५. कन्दुकमिव पातः, कन्दुकपातः (कर्मधारय) तेन कन्दुकपातेन
६. पातेन + उत्पतति + आर्यः (आद् गुणः, इकोयणचि)
७. पतन् + अपि = पतन्नपि (ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम्)