भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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स्वामिसमुद्देशः ६१ समस्त लोकपाल राजा का अनुसरण करते हैं। अतः मध्यम श्रेणी का भी राजा उत्तम लोकपाल कहा जाता है। राजसहायता के अधिकारी— अव्यसनेन क्षीणधनान् मूलधनप्रदानेन कुटुम्बिनः प्रतिसंभाव- येत् ॥ ५३ ॥ द्यूत, मद्यपान आदि किसी व्यसन के कारण नहीं, किन्तु अन्य किसी कारण से अर्थात् चोरी, व्यापारिक घाटा आदि से जिनका धन नष्ट हो गया हो ऐसे कुटुम्बियों को राजा मूलधन-पूंजी के निमित्त धन प्रदान कर समा- दृत करे। राजा का कुटुम्ब और कलत्र— राज्ञो हि समुद्रावधिर्मही स्वकुटुम्बम्, कलत्राणि तु वंशवर्धन- क्षेत्राणि ॥ ५४ ॥ समुद्रपर्यन्त पृथिवी राजा का अपना कुटुम्ब है और उसके उर्वर खेत उसका वंशवर्धन करनेवाले कलत्र हैं। भेंट और उपहार के विषय में राजा का कर्त्तव्य— अर्थिनामुपायनमप्रतिकुर्वाणो न कुर्यात् ॥ ५५ ॥ उपकार न कर सके तो राजा कार्यार्थियों की भेंट न स्वीकार करे। हास-उपहास के नियम— आगन्तुकैरसहनैश्च सह नर्म न कुर्यात् ॥ ५६ ॥ अपरिचित और असहिष्णु व्यक्तियों के साथ परिहास-हंसी मजाक न करे। बड़ों से संभाषण का नियम— पूज्यैः सह नाधिरुह्य वदेत् ॥ ५७ ॥ आदरणीय व्यक्तियों के साथ कुर्सी पलंग आदि किसी आसन पर चढ़कर बातें न करें। झूठी आशा देना अनुचित— भृत्यमशक्यमप्रयोजनं च जनं नाशया क्लेशयेत् ॥ ५८ ॥ असमर्थ, सेवक और निःस्वार्थ व्यक्ति को झूठी आशा देकर पीडित न करे। दासता और धन— पुरुषो हि न पुरुषस्य दासः किन्तु धनस्य ॥ ५९ ॥ पुरुष पुरुष का दास नहीं होता किन्तु धन का दास होता है। यही बात महाभारत के भीष्मपर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर से कही है।