भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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१०० नीतिवाक्यामृतम् भ्रष्टाचार रोकने का उपाय— नित्यपरीक्षणं, कर्मविपर्ययः, प्रतिपत्तिदानं च नियोगिष्वर्थग्रहो- पायाः ॥ ५५ ॥ अधिकारियों द्वारा अन्यायोपार्जित धन को प्राप्त करने के लिये राजा के पास तीन उपाय हैं। हिसाब की नित्य जाँच करते रहना, सौंपे गये काम की बदला-बदली करते रहना और समय-समय पर अधिकारियों को पुरस्कृत करते रहना। नापीडिता नियोगिनो दुष्टव्रणा इवान्तः सारमुद्वमन्ति ॥ ५६ ॥ जिस प्रकार दूषित फोड़े का भीतरी दोषयुक्त पदार्थ मवाद आदि बिना कसकर दबाये हुए नहीं निकलता उसी प्रकार बिना दण्ड के अधिकारी छिपाये हुए धन को नहीं देते। पुनः पुनरभियोगो नियोगिषु महीपतीनां वसुधारा ॥ ५७ ॥ राजकीय आय का अपहरण करनेवाले अधिकारियों की पुनः पुनः भर्त्सना करते रहना राजा के लिये धन का स्रोत बन जाता है। सकृन्निष्पीडितं स्नानवस्त्रं किं जहाति सार्द्रताम् ॥ ५८ ॥ एक बार निचोड़े गये स्नान-वस्त्र से क्या पूरा जल निकल जाता है ? देशमपीडयन् बुद्धिपुरुषकाराभ्यां पूर्वनिबन्धमधिकं कुर्वन्नर्थमानौ लभते ॥ ५६ ॥ देशवासियों को कष्ट न देकर जो अपने बुद्धि कौशल और उद्योग के द्वारा राज्य की सम्पत्ति को पूर्वापेक्षा अधिक कर सके वह अमात्य राजा के द्वारा सम्पत्ति और सम्मान दोनों ही प्राप्त करता है। यो यत्र कर्मणि कुशलस्तं तत्र विनियोजयेत् ॥ ६० ॥ जो जिस कार्य में कुशल हो उसे उसी कार्य में लगावे । अर्थात् आदमी के योग्यता के अनुकूल काम सौंपना राजा का कर्तव्य है। न खलु स्वामिप्रसादः सेवकेषु कार्यसिद्धिनिबन्धनं किन्तु बुद्धि- पुरुषकारावेव ॥ ६१ ॥ सेवक के द्वारा कार्य की सिद्धि स्वामी की कृपा मात्र से नहीं होती किन्तु उसके लिये उसकी अपनी बुद्धि और उद्योग ही मूल कारण होते हैं। शास्त्रविदप्यदृष्टकर्मा कर्मसु विषादं गच्छेत् ॥ ६२ ॥ कार्य का अनुभव न रहने पर शास्त्रों को जाननेवाला भी व्यक्ति किंकर्तव्य विमूढ हो जाता है। अनिवेद्य भर्त्तने किञ्चिदारम्भं कुर्यादन्यत्रापत्प्रतीकारेभ्यः ॥ ६३ ॥