नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ नीतिवाक्यामृतम् गठुर या बक्स आदि चुङ्गीघरों पर खोलवाकर देखा जाता है इसीलिये उसका नाम पण्यपुटभेदिनी विष्ठा है। विष्ठा शब्द साहित्य में नया प्रयोग है। इसका किसी लौकिक अपभ्रंश से सम्बन्ध होगा। इन चुङ्गीघरों पर किसी प्रकार की जोर-जबरदस्ती और अन्याय न हो अर्थात् ज्यादा चुङ्गी न ले ली जाय, चोरी की चीज समझ में आवे तो पता लगाकर उसके मालिक को दे दी जाय इत्यादि। ऐसा होने से इन शुल्क स्थानों से राजा की आय बहुत अच्छी होती है। राज्ञां चतुरङ्गबलाभिवृद्धये भूयांसो भक्तग्रामाः ॥ २२ ॥ राजाओं की चतुरङ्गिणी सेना की वृद्धि के लिये बहुत से धान्य के खेत वाले गांव सुरक्षित रहने चाहिए। अर्थात् ऐसे गांवों को किसी अन्य को लगान पर नहीं देना चाहिए। उनमें जो कुछ उत्पन्न हो वह सब चतुरङ्गिणी सेना के भक्ष्य-भोज्य के लिये हो। सुमहच्च गोमण्डलं हिरण्याय, युक्तं च शुल्कं कोशवृद्धिहेतुः ॥ २३ ॥ विनिमय में सुवर्ण प्राप्ति के लिये राज्य में प्रचुर गायों का होना और युक्त अर्थात् न्याय कर ये दोनों राजा के कोश की वृद्धि के कारण हैं। भूदान विषयक विचार- देवद्विजप्रदेया गोरुतप्रमाणा भूमिर्दातुरादातुश्च सुखनिर्वाहा ॥ २४ ॥ देवता और ब्राह्मण को दी जाने वाली भूमि जहां तक एक गौ के रंभाने का शब्द सुनाई पड़े उतनी ही अर्थात् स्वल्प हो क्योकि इससे दाता और ग्रहण कर्त्ता दोनों को सुख होता है थोड़ी जमीन देने में दाता को कष्ट नहीं होता और ग्रहीता को प्रबन्ध में सरलता होती है। क्षेत्र, वप्र, खण्ड, गृह, धर्मायतनानामुत्तरः पूर्वं बाधते न पुनरुत्तरं पूर्वः ॥ २५ ॥ क्षेत्र, कोट, खाई आदि, तालाब, गृह और देवमन्दिर इन सब में क्रमशः उत्तरोत्तर का महत्त्व है पूर्व से उत्तर का बाध नहीं है। राज्य की किसी परती = खाली जमीन को कोई खेत बनाये दूसरा उस पर कोट बना ले अथवा चहारदिवारी घिरवा दे, तीसरा तालाब बनवावे चौथा आदमी मकान बनवा ले और पांचवां उसे देवमन्दिर का रूप दे दे और अन्त में विवाद उठ खड़ा हो कि स्वामित्व किसका तो क्रमशः महत्त्व की दृष्टि से मन्दिर बना देने वाले का अधिकार प्रबल होगा। दान की दृष्टि से भी इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठता है। [ इति जनपदसमुद्देशः ]