नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ नीतिवाक्यामृतम् देहिनि गतायुषि सकलाङ्गे किं करोति धन्वन्तरिरपि वैद्यः ॥ ६ ॥ जब प्राणी की आयु ही निःशेष हो गई हो तब समस्त अंगों के होते हुए भी धन्वन्तरि भी वैद्य के रूप में क्या कर सकते हैं ? राजा की रक्षा के लिये विचारणीय क्रम— राज्ञस्तावदासन्नाः स्त्रिय आसन्नतरा दायादा, आसन्नतमाश्च पुत्रा- स्ततो राज्ञः प्रथमं स्त्रीभ्यो रक्षणं ततो दायादेभ्यस्ततः पुत्रेभ्यः ॥ ७ ॥ राजा की समीपवर्तिनी स्त्रियां होती हैं, उनसे अधिक समीपवर्ती दायाद- पट्टीदार और उनसे भी निकटतम पुत्र होते हैं । अतः सर्व प्रथम स्त्रियों से राजा की रक्षा करनी चाहिए उसके अनन्तर पट्टीदारों से और तब पुत्रों से रक्षा करनी चाहिए । आप्लवङ्गादाचक्रवर्त्तिनः सर्वोऽपि स्त्रीसुखाय क्लिश्यति ॥ ८ ॥ वानर से लेकर चक्रवर्ती राजा तक सभी व्यक्ति स्त्री-सुख की प्राप्ति के लिये ही क्लेश उठाते हैं । निवृत्तस्त्रीसङ्गस्य धनपरिग्रहो मृतमण्डनमिव ॥ ६ ॥ वनिताओं के सुख भोग से विरक्त व्यक्ति के लिये धन का संचय मृतक को वस्त्राभूषण आदि से सुसज्जित करने के समान व्यर्थ है । स्त्रियों की प्रकृति का वर्णन— सर्वाः स्त्रियः क्षीरोदवेला इव विषामृतस्थानम् ॥ १० ॥ सभी स्त्रियां क्षीरसमुद्र के समान विष और अमृत दोनों का स्थान हैं । समुद्रमन्थन करने पर उसी से हलाहल विष और अमृत दोनों ही निकले थे उसी प्रकार स्त्रियां अमृत के समान सुखदायक और विष के समान दुःखदायक दोनों ही हैं । मकरदंष्ट्रा इव स्त्रियः स्वभावादेव वक्रशीलाः ॥ ११ ॥ मगर की दाढ़ के समान स्त्रियां स्वभाव से ही कुटिल स्वभाव वाली होती हैं । स्त्रीणां वशोपायो देवानांमपि दुर्लभः ॥ १२ ॥ स्त्रियों को वश में कर लेने का उपाय देवताओं के लिये भी दुर्लभ है । कलत्रं रूपवत् , सुभगम् , अनवद्याचारम् , अपत्यवदिति महतः पुण्यस्य फलम् ॥ १३ ॥ स्त्री-सुन्दरी, सौभाग्यशालिनी, अनिन्द्य चरित्रवाली और संतानवाली हो यह महान् पुण्य से होता है । कामदेवोत्सङ्गस्थापि स्त्री पुरुषान्तरम् अभिलषति च ॥ १४ ॥