भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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१३० नीतिवाक्यामृतम् २५. दिवसानुष्ठानसमुद्देश इस समुद्देश में आचार्यप्रवर ने मानव जीवन को सुखमय बनाने वाली सुन्दर दिनचर्या का विस्तृत वर्णन किया है अतः यह समुद्देश अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है— ब्राह्मे मुहूर्त्त उत्थायेतिकर्त्तव्यतायां समाधिमुपेयात् ॥ १ ॥ प्रातः काल ब्राह्म मुहूर्त्त में उठकर एकाग्रचित्त से अपने कर्त्तव्य कर्म का चिन्तन करे । सुखनिद्राप्रसन्ने मनसि प्रतिफलन्ति यथार्थग्राहिका बुद्धयः ॥ २ ॥ उस समय सुख-पूर्वक निद्रा से प्रसन्न चित्त में सद्विचार प्रतिबिम्बित होते हैं । उदयास्तमनशायिषु धर्मकालातिक्रमः ॥ ३ ॥ सूर्योदय ओर सूर्यास्त के समय सोने वालों का धार्मिक कृत्यों का समय निकल जाता है । आत्मवक्त्रमाज्ये दर्पणे वा निरीक्षेत ॥ ४ ॥ प्रातः काल उठकर अपना मुख घृत अथवा दर्पण में देखे । न प्रातर्वर्षवरं विकलाङ्गं वा पश्येत् ॥ ५ ॥ प्रातः काल नपुंसक और अङ्गहीनों का दर्शन न करे । सन्ध्यास्वधौतमुखपादं ज्येष्ठा देवता नानुगृह्णाति ॥ ६ ॥ सूर्योदय और सूर्यास्त की सन्धि वेला में जिसका मुख और पैर प्रक्षालित नहीं होता उस पर महान् देवता अनुग्रह नहीं करते । नित्यम् अदन्तधावनस्य नास्ति मुखशुद्धिः ॥ ७ ॥ नित्य दन्त धावन न करने वाले का मुख अशुद्ध रहता है अर्थात् स्वच्छ न होने के कारण उससे दुर्गन्ध आता है । न कार्यव्यासङ्गेन शारीरं कर्मोपहन्यात् ॥ ८ ॥ कार्यों में आसक्त होकर शारीरिक कर्मों का परित्याग न करे । न खलु युगैरपि तरङ्गविगमात् सागरे स्नानम् ॥ ६ ॥ समुद्र की तरङ्गें युग-युग से भी शान्त हो गई हों तब भी उसमें स्नान नहीं करना चाहिए । वेग-व्यायाम-स्वाप-स्नान - भोजन - स्वच्छन्दवृत्ति कालान्न्योपरु- न्ध्यात् ॥ १० ॥ मल-मूत्र आदि के परित्याग का वेग, व्यायाम, शयन, स्नान, भोजन ओर स्वच्छन्द रूप से घूमने आदि के नियत समय का अतिक्रमण न करे ।