नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
पृष्ठ 151, कुल 220 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिवसानुष्ठानसमुद्देशः १९५ अत्यन्त थका हुआ व्यक्ति यदि विश्राम किये बिना भोजन या जलपान करता है तो उससे उसे ज्वर या वमन होता है । न जिहत्सुर्न प्रस्रोतुमिच्छुर्नासमञ्जसमनाश्च नानपनीय पिपासोद्रेक- मश्नीयात् ॥ ४९ ॥ जब मल और मूत्र त्याग की इच्छा हो मन आकुल हो और अत्यधिक प्यास लगी हो तब मल-मूत्र त्याग किये बिना और मन को शान्त तथा प्यास को दूर किये बिना भोजन न करे । भुक्त्वा व्यायामव्यवायौ सद्यो विपत्तिकारणम् ॥ ५० ॥ भोजन के अनन्तर शीघ्र ही व्यायाम और मैथुन करने से तत्काल आपत्ति अर्थात् व्याधि उत्पन्न होती है । आजन्मसात्म्यं विषमपि पथ्यम् ॥ ५१ ॥ जन्मकाल से ही जो भोज्य अपनी प्रकृति के अनुकूल हो गया हो वह विष भी पथ्य होता है । असात्म्यमपि पथ्यं सेवेत न पुनः सात्म्यमप्यपथ्यम् ॥ ५२ ॥ प्रकृति के अनुकूल न भी हो किन्तु पथ्य हो तो उसका सेवन करना चाहिए, किन्तु प्रकृति के अनुकूल पड़ने पर भी अपथ्य पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए । सर्वं बलवतः पथ्यमिति न कालकूट सेवेत ॥ ५३ ॥ बलशाली के लिये सब कुछ पथ्य ही है ऐसा समझकर कालकूट अर्थात् जहर न खावे । सुशिक्षितोऽपि विषतन्त्रज्ञो म्रियत एव कदाचिद् विषात् ॥ ५४ ॥ विषशास्त्र को जानने वाला सुशिक्षित भी व्यक्ति कभी विष से ही मर जाता है । संविभज्यातिथिष्वाश्रितेषु च स्वयमाहरेत् ॥ ५५ ॥ भोज्य पदार्थ को अतिथियों और आश्रितों को बांट कर तब स्वयं भोजन करे । देवान् गुरून् धर्मं चोपचरन्न व्याकुलमतिः स्यात् ॥ ५६ ॥ देवता गुरु और धर्म की सेवा के समय चित्त को अशान्त न रखे । व्याक्षेपभूमौमनोनिरोधो मन्दयति सर्वाण्यपीन्द्रियाणि ॥ ५७ ॥ चित्त में चञ्चलता उत्पन्न करने वाले स्थान पर बैठकर मन का निरोध करने से समस्त इन्द्रियाँ शिथिल हो जातीं हैं । स्वच्छन्दवृत्तिः पुरुषाणां परमं रसायनम् ॥ ५८ ॥ स्वच्छन्दता-पूर्वक जीवन निर्वाह करना मनुष्य के लिये उत्कृष्ट रसायन है ।