भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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१४० नीतिवाक्यामृतम् पद्मिनी जाति की स्त्री के लिये उत्तर दिशा का प्रचुर वर्षा वाला प्रदेश विशेष रूप से अनुराग क्रीड़ा में सहायक होता है । अर्थात् प्रथम प्रकृति के नवदम्पति को उत्तर दिशा वाले वर्षायुक्त प्रदेशों में काम-क्रीडा में विशेष आनन्द का अनुभव होता है । द्वितीयप्रकृतिः सशाद्वलमृदूपवनप्रदेशः ॥ १०२ ॥ इसी प्रकार द्वितीय प्रकृति अर्थात् शशजाति के पुरुष और शंखिनी जाति की स्त्री के लिये हरियाली से सुशोभित मनोरम उपवन, बाग, हराभरा जंगल आदि विशेष आनन्ददायक होता है । तृतीयप्रकृतिः सुरतोत्सवाय स्यात् ॥ १०३ ॥ इसी प्रकार तृतीय प्रकृति अर्थात् अश्व प्रकृति का पुरुष रतिकर्म में अत्यन्त आह्लादकर होता है । स्त्रीपुंसयोर्न सम-समायोगात् परं वशीकरणमस्ति ॥ १०४ ॥ परस्पर समान प्रकृति के संयोग से बढ़कर अन्य कोई उपाय स्त्री और पुरुष के वशीकरण के लिये नहीं है । प्रकृतिरूपदेशः [स्वाभाविकं च प्रयोगवैदग्ध्यमिति सम-समायोग- कारणानि ॥ १०५ ॥ समान प्रवृत्ति का होना, कामशास्त्र का समुचित शिक्षण और स्वाभाविक व्यवहार चातुर्य ये सब संयोग के हेतु हैं । क्षुत्तर्ष-पूरीषाभिष्यन्दार्त्तस्याभिगमो नापत्यमनवद्यं करोति ॥ १०६ ॥ भूख प्यास और मल-मूत्र के वेग से पीड़ित स्त्री पुरुषों के संयोग से उत्तम सन्तान नहीं होती । न सन्ध्यासु न दिवा नाप्सु न देवायतने मैथुनं कुर्वीत ॥ १०७ ॥ सन्ध्याकाल, दिन और जल तथा देवमन्दिर में मैथुन न करे । पर्वणि पर्वणि सन्धौ उपहते वाहि कुलस्त्रियं न गच्छेत् ॥ १०८ ॥ अमावास्या-पूर्णिमा आदि पर्व, प्रातः सायं की सन्धि वेला और ग्रहण वाले दिन में कुल-स्त्री अर्थात् अपनी विवाहिता स्त्री के साथ समागम न करे । न तद्गृहाभिगमने कामपि स्त्रियमधिशयीत ॥ १०६ ॥ किसी पराई स्त्री के घर जाकर उसके साथ शयन न करे । वंशवयोवृत्तविद्याविभवानुरूपो वेषः समाचारो वा न विड- म्बयति ॥ ११० ॥ वंश, अवस्था, सदाचार, विद्या और अपने ऐश्वर्य के अनुरूप वेष-भूषा रखने तथा व्यवहार करने से किसी को कोई विडम्बना निन्दा आदि नहीं होती ।