नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसदाचारसमुद्देशः १४५ अभिभवनमन्त्रेण परोपकारो महापातकिनां न महासत्त्वानाम् ॥३५॥ किसी अभिलाषा से परोपकार करना महापातकियों का कार्य है, महा- पुरुषों का नहीं। तस्य भूपतेः कुतोऽभ्युदयो जयो वा यस्य द्विषत्सभासु नास्ति गुण- ग्रहणप्रागल्भ्यम् ॥ ३६ ॥ शत्रुओं की भी सभा में जिस राजा की कीर्त्ति का गान नहीं किया जाता उसका जय और अभ्युदय कैसा ! अर्थात् राजा को इतना प्रभावशाली होना चाहिए कि शत्रु भी उसके गुणों और प्रभाव का लोहा मानें। तस्य गृहे कुटुम्बं धरणीयं यत्र न भवति परेषामाभिषम् ॥ ३७ ॥ आपत्ति के समय पलायन करते समय अपने कुटुम्ब को ऐसे व्यक्ति के यहां छोड़ जाना चाहिए जहाँ कुटुम्ब को दूसरे के द्वारा कोई हानि न हो। परस्त्रीद्रव्यरक्षणेन नात्मनः किमपि फलं विप्लवेन महाननर्थ- सम्बन्धः ॥ ३८ ॥ दूसरे की स्त्री और द्रव्य रखने से अपना कोई लाभ नहीं होता किन्तु यदि किसी प्रकार का उपद्रव हुआ तो उससे महान् अनर्थ होता है। आत्मानुरक्तं कथमपि न त्यजेत् यथास्ति तदन्ते तस्य सन्तोषः ॥ ३९ ॥ अपने यहां रहने में जिसे परम सन्तोष हो और जो अपने ऊपर अनुरागी हो ऐसे व्यक्ति का परित्याग कभी भी नहीं करना चाहिए। आत्मसंभावितः परेषां भृत्यानामसहमानश्च भृत्यो हि बहुपरिजन- मपि करोत्येकाकिनं स्वामिनम् ॥ ४० ॥ जो नौकरों की बढ़ती न देख सके और अपने को बहुत बड़ा माने ऐसे भृत्य के होने से राजा के बहुत से भी सेवक धीरे-धीरे करके चले जाते हैं और राजा अकेला रह जाता है। अतः राजा को चाहिए कि वह सेवकों में प्रमुख ऐसे व्यक्ति को बनावे जो अपने साथी सेवकों की तरक्की से प्रसन्न हो और स्वयं विनम्र स्वभाव का हो। अपराधानुरूपो दण्डः पुत्रेऽपि प्रणेतव्यः ॥ ४१ ॥ अपराध के अनुसार पुत्र को भी दण्ड देना चाहिए। देशानुरूपः करो ग्राह्यः ॥ ४२ ॥ देश की स्थिति के अनुसार ही कर ग्रहण करना चाहिए। प्रतिपाद्यानुरूपं वचनम् उदाहर्त्तव्यम् ॥ ४३ ॥ प्रतिपादन किये जाने वाले विषय के अनुकूल ही वाणी का प्रयोग करे। अर्थात् लोगों को जैसा विषय समझाना हो वैसी ही भाषा का व्यवहार करे। १० नी०