भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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सदाचारसमुद्देशः १४७ व्रतं, विद्या, सत्यमानृशंस्यमलौल्यता च ब्राह्मण्यं न पुनर्जाति- मात्रम् ॥ ५७ ॥ शुभ संकल्प, सद्विद्या का अभ्यास, सत्यपालन, अक्रूरता और गाम्भीर्य गुणों से मनुष्य ब्राह्मण होता है केवल ब्राह्मण जाति में जन्म लेने से नहीं । निःस्पृहाणां का नाम परापेक्षा ॥ ५८ ॥ जो व्यक्ति निःस्पृह हैं—जिनको किसी बात का अभिलाष नहीं हैं उनको दूसरे व्यक्ति की सहायता आदि की क्या आवश्यकता है । कं पुरुषमाशा न क्लेशयति ॥ ५९ ॥ आशा किसे नहीं दुख देती । स संयमी गृहाश्रमी वा यस्याविद्यातृष्णाभ्यामनुपहतं चेतः ॥ ६० ॥ जिसके हृदय में अज्ञान और तृष्णा नहीं है वही व्यक्ति वस्तुतः संयमी और गृहस्थ है। शीलमलंकारः पुरुषाणां न देहखेदावहो बहिः ॥ ६१ ॥ पुरुषों के लिये 'शील' ऐसा आभूषण है जो बाहर से देह को किसी प्रकार का कष्ट नहीं देता अथवा भार नहीं लगता । अप्रियकर्त्तुर्न प्रियकरणात् परम् आचरणम् ॥ ६३ ॥ अप्रिय आचरण करने वाले व्यक्ति के प्रति प्रिय व्यवहार करना सर्वश्रेष्ठ आचरण है । अप्रयच्छन्नर्थिने न परुषं ब्रूयात् ॥ ६४ ॥ जिसे कुछ देना न चाहे ऐसे याचक के प्रति कम से कम कठोर वचन तो न बोले । स स्वामी मरुभूमियेत्रार्थिनो न भवन्तीष्टकामाश्च ॥ ६५ ॥ वह स्वामी मरुभूमि के समान है जिससे याचकों की अभीष्ट याञ्चा न पूर्ण हो । प्रजापालनं हि राज्ञो यज्ञो न पुनर्भूतानामालम्भः ॥ ६६ ॥ राजा का यज्ञ प्रजापालन है न कि जीवों की बलि देना । प्रभूतमपि नानपराधसत्त्वव्यावृत्तये नृपाणां बलं धनुर्वा किन्तु शरणागतरक्षणाय ॥ ६७ ॥ राजा की प्रचुरशक्ति सैन्य बल आदि अथवा दृढ़ धनुष निरपराध व्यक्तियों को नष्ट करने के लिये नहीं किन्तु शरणागतों की रक्षा के लिये होता है । [ इति सदाचारसमुद्देशः ]