नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषाड्गुण्यसमुद्देशः १६१ २९. षाड्गुण्यसमुद्देशः शमव्यायामौ योगक्षेमयोर्योनिः ॥ १ ॥ शम और व्यायाम योग क्षेम के कारण हैं। कर्मफलोपभोगानां क्षेमसाधनः शमः, कर्मणां योगाराधनो व्यायामः ॥ २ ॥ अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त फल को भोगने में सहायक कल्याणकारी साधनों का नाम शम है, और नवीन कर्म करने के उद्योग का नाम व्यायाम है। दैवं धर्माधर्मौ ॥ ३ ॥ अपना ही पूर्व जन्म का किया हुआ धर्म अथवा अधर्म, सुकृत अथवा दुष्कृत 'दैव' है। मानुषं नयानयौ ॥ ४ ॥ अपना ही नीतिपूर्ण अथवा अनीतिपूर्ण व्यवहार मानुष कर्म है। दैवं मानुषं च कर्म लोकं यापयति ॥ ५ ॥ दैव और मानुष दोनों कर्मों के योग से मनुष्य का दैनिक जीवन निर्वाह होता है। तच्चिन्त्यमचिन्त्यं वा दैवम् ॥ ६ ॥ मनुष्य चाहे तो दैव कर्म की चिन्ता करे चाहे न करे क्योंकि वह तो होकर ही रहेगा। अतः उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। अचिन्तितोपस्थितोऽर्थसम्बन्धो दैवायत्तः ॥ ७ ॥ बिना सोच विचार के प्राप्त विषयों से सम्बन्ध होना दैवाधीन है। बुद्धिपूर्वं हिताहितप्राप्तिपरिहारसम्बन्धो मानुषायतः ॥ ८ ॥ ज्ञानपूर्वक हितकर कार्य करना और अहितकर से बचना मनुष्य के अधीन है। सत्यपि दैवेऽनुकूले न निष्कर्मणो भद्रमस्ति ॥ ९ ॥ दैव के अनुकूल होने पर भी बिना कर्म किये मनुष्य का कल्याण नहीं हो सकता। न खलु दैवमीहमानस्य कृतमप्यन्नं मुखे स्वयं प्रविशति ॥ १० ॥ दैव वादी के समक्ष उपस्थित भोजन स्वयं ही उसके मुखमें नहीं प्रविष्ट हो जाता। न हि दैवमवलम्बमानस्य धनुः स्वयमेव शरान् सन्धत्ते ॥ ११ ॥ दैववादी का धनुष अपने आप बाणों को नहीं चढ़ा लेता। ११ नी०