भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 220 में से

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१६८ नीतिवाक्यामृतम् देने को तैयार हो तो 'द्वैधीभाव" अर्थात् बलिष्ठ से सन्धि एवं निर्बल से युद्ध की नीति का आश्रय लेना चाहिए। अथवा मन में कुछ और तथा ऊपर से कुछ और की नीति का आश्रय लेकर स्थिति के अनुकूल विजय प्राप्त करनी चाहिए। बलद्वयमध्यस्थितः शत्रुरुभयसिंहमध्यस्थितः करीव भवति सुख- साध्यः ॥ ६३ ॥ दो बलशाली राजाओं के बीच पड़ा हुआ शत्रु दो सिंहों के बीच पड़े हुए हाथी के समान सुखपूर्वक नष्ट किया जा सकता है। भूम्यर्थिनं भूफलप्रदानेन सन्दध्यात् ॥ ६४ ॥ शत्रु अथवा अन्य व्यक्ति यदि भूमिका प्रार्थी हो तो उसे भूमि न देकर उसकी उपज देना चाहिए। भूफलदानम् अनित्यं, परेषु भूमिर्गता गतैव ॥ ६५ ॥ भूमि की उपज देनेवाली बात अनित्य है, किन्तु दूसरे के पास भूमि जाने पर वह सदा के लिये चली जाती है। अवज्ञायापि भूमावारोपितस्तरुर्भवति बद्धतलः ॥ ६६ ॥ भूमि में उपेक्षा के साथ भी लगाया गया वृक्ष जड़ जमाकर दृढ़ हो हो जाता है। उपायोपपन्नविक्रमोऽनुरक्तप्रकृतिरल्पदेशोऽपि भूपति र्भवति सार्व- भौमः ॥ ६७ ॥ साम, दान, दण्ड, भेद इन उपायों के साथ पराक्रम करने वाला और अनुरक्त प्रजावाला राजा थोड़े ही प्रदेश का स्वामी होने पर भी चक्रवर्ती के तुल्य होता है। न हि कुलागता कस्यापि भूमिः किन्तु वीरभोग्या वसुन्धरा ॥ ६८ ॥ वंश परम्परा से प्राप्त भूमि किसी की भूमि नहीं होती, किन्तु यह वसु- न्धरा वीरों के द्वारा भोगी जाती है। अर्थात् वंश परम्परा से अथवा अन्य प्रकार से प्राप्त पृथ्वी का भोग वही मनुष्य कर सकता है जो वीर और उत्साह सम्पन्न होता हैं अन्यथा उसके कारण अन्य व्यक्ति उस पृथ्वी या' राज्य पर अपना अधिकार कर लेते है। सामोपप्रदानभेददण्डा उपायाः ॥ ६६ ॥ साम, उपप्रदान, भेद और दण्ड यह चार उपाय हैं। तत्र पञ्चविधं साम, गुणसंकीर्तनं सम्बन्धोपाख्यानं, परोपकारदर्शन- मायतिप्रदर्शनमात्मोपनिबन्धनमिति ॥ ७० ॥ साम पाँच प्रकार का है, गुण संकीर्तन अर्थात् शत्रु को वश में करने के