भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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१७० नीतिवाक्यामृतम् कारक है । अर्थात् मित्र प्राप्ति से सुवर्ण प्राप्ति अच्छी और उससे भी अच्छी भूमि की प्राप्ति है । हिरण्यं भूमिलाभाद् भवति मित्रञ्च हिरण्यलाभादिति ॥ ७६ ॥ भूमि के लाभ से सुवर्ण होता है और सुवर्ण अर्थात् धन से मित्र प्राप्ति होती है । शत्रोर्मित्रत्वकारणं विमृश्य तथा चरेद् यथा न वञ्च्यते ॥ ८० ॥ शत्रु यदि मित्रता करना चाहे तो उसकी मित्रता के कारणों पर विचार करके उसके साथ ऐसा सतर्क व्यवहार रखे जिससे वञ्चित न होना पड़े । गूढोपायेन सिद्धकार्यस्यासंवित्तिकरणं सर्वा शङ्कां दुरपवादं च करोति ॥ ८१ ॥ जिस व्यक्ति ने गूढ़ उपायों द्वारा राजा का कार्य सिद्ध किया हो उसका अनादर करने से उस कार्य सिद्ध करने वाले के मन में अनेक प्रकार की आशङ्काएं उत्पन्न होती हैं और राजा का भी कृतघ्न के रूप में अपयश होता है । गृहीतपुत्रदारानुभयवेतनान् कुर्यात् ॥ ८२ ॥ दोनों ओर से वेतन पाने वाले के स्त्री पुत्रों का संरक्षण राजा को करना चाहिए । उभय वेतन ऐसा चतुर वह व्यक्ति है जो एक राजा का वेतन भोगी गुप्तचर होकर दूसरे राज्य में भेद लेने जाय किन्तु वहां भी कुछ ऐसा व्यव- हार प्रदर्शित करे जिससे वहां विश्वस्त बनकर वहां भी वेतन मिले । शत्रुमपकृत्य भूदानेन तद्दायादानात्मनः सफलयेत् क्लेशयेद्वा ॥८३॥ शत्रु का अपकार अर्थात् उसकी धन-धरती छीन कर उसे उसके दायादों को देकर उन्हें अपना बना ले अथवा वे बलिष्ठ होकर सर उठावें तो उनको दण्डित और पीड़ित करे । परविश्वासजनने सत्यं शपथः प्रतिभूः प्रधानपुरुषप्रतिग्रहो वा हेतुः ॥ ६४ ॥ शत्रु पर विश्वास चार कारणों से किया जा सकता है—उसका सत्य-व्य- वहार, शपथग्रहण, जमानत, और उसके प्रधान अमात्य आदि का अपनी ओर ग्रहण अर्थात् पूर्णरूप से मिल जाना । सहस्रैकीयः पुरस्ताल्लाभः शतैकीयः पश्चात् कोप इति न यायात् ॥ ८५ ॥ प्रथम तो प्रचुर लाभ हो किन्तु अन्तमें कुछ उपद्रव की संभावना हो तो शत्रु पर आक्रमण करने के लिये प्रस्थान न करे ।