नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० नीतिवाक्यामृतम उपचीयमानो घटेनेवाश्मा हीनेन विग्रहं कुर्यात् ॥ ६० ॥ जब अपना अभ्युदय हो रहा हो तब अपनी लघुसेना के कारण हीनशक्ति होकर भी महान् शत्रु के साथ युद्ध करना चाहिए । पत्थर का छोटा सा भी टुकड़ा घड़े से टक्कर लेकर उसे फोड़ डालता है । दैवानुलोम्यं, पुण्यपुरुषोपचयोऽप्रतिपक्षता च विजिगीषोरुप- चयः ॥ ६१ ॥ दैव की अनुकूलता, उत्तम पुरुषों का समागम, और विरोधियों का अभाव यह सब विजिगीषु के अभ्युदय के लक्षण हैं । पराक्रमकर्कशः प्रवीरानीकश्चेद् हीनः सन्धाय साधूपचरि- तव्यः ॥ ६२ ॥ शत्रु यदि प्रबल पराक्रमी और वीर पुरुषों की सैन्यशक्ति से सम्पन्न हो तो हीन विजिगीषु को सन्धि के द्वारा सम्यक् व्यवहार करना चाहिए । दुःखामर्षजं तेजो विक्रमयति ॥ ६३ ॥ दुःख से अर्थात् शत्रु द्वारा पीड़ित होने पर क्रोध होता है जिससे तेज- स्विता आती है और पुरुष पराक्रम के लिये तत्पर होता है । स्वजीविते हि निराशस्यावार्यो भवति वीर्यवेगः ॥ ६४ ॥ अपने प्राणों की आशा न रखकर जो युद्ध में प्रवृत्त होता है उसका शौर्य- वेग अजेय होता है । अर्थात् 'कार्यं वा साधयामि शरीरं वा पातयामि' इस संकल्प के साथ जो संग्राम भूमि में अवतीर्ण होता है और अपने प्राणों का मोह छोड़ कर लड़ता है उस योद्धा के आक्रमण के वेग को रोकना दुष्कर होता है । लघुरपि सिंहशावो हन्त्येव दन्तिनम् ॥ ६५ ॥ छोटा भी सिंहशावक हाथी को मार ही डालता है । नातिभग्नं पीडयेत् ॥ ६६ ॥ जो शत्रु अत्यन्त दलित हो चुका हो उसे क्लेश न दे । अर्थात् युद्ध में पराजय के कारण अत्यन्त दुर्दशाग्रस्त होकर जो भाग रहा हो उसका पीछा न करना चाहिए । सम्भव है वह अपने जीवन से निराश होकर 'मरता क्या न करता' उक्ति के अनुसार पुनः समस्त शक्ति से कोई उपद्रव कर दे और उससे अपनी हानि हो जाय । शौर्यैकघनस्योपचारो मनसि तच्छागस्येव पूजा ॥ ६६ ॥ प्रबल पराक्रमी के प्रति सम्मान का बाह्य प्रदर्शन उसके मन में वैसा ही दोष उत्पन्न करता है जैसा कि देवता की पूजा न करके उसके बकरे की पूजा करने से देवता को रोष होता है ।