नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ नीतिवाक्यामृतम् संग्राम में पकड़े गये आक्रमणकारियों को सत्कारपूर्वक अर्थात् कुछ वस्त्र आदि उपहार देकर छोड़ देना चाहिए । मतिनदीयं नाम सर्वेषां प्राणिनामुभयतो वहति पापाय धर्माय च, तत्राद्यं स्रोतोऽतीव सुलभं, दुर्लभं तद् द्वितीयमिति ॥ ७७ ॥ इस संसार में समस्त प्राणियों के दो पार्श्वों में पाप और पुण्य के लिये मति अर्थात् विवेकरूपी सरिता प्रवाहित हो रही है, जिसमें पाप का स्रोत अत्यन्त सुलभ है, किन्तु धर्म का—पुण्य का—स्रोत दुर्लभ है । अर्थात् मनुष्य पाप की ओर सहज रूप से प्रवृत्त होता है; किन्तु धर्म की ओर कठिनता से । सत्येनापि शप्तव्यम् ॥ ७८ ॥ शत्रु के हृदय में विश्वास उत्पन्न कराने के लिये सत्य भाव से भी शपथ करनी चाहिए । महतामभयप्रदानवचनमेव शपथः ॥ ८० ॥ अभयदान देना ही महान् पुरुषों की शपथ है । सतामसतां च वचनायत्ताः खलु सर्वे व्यवहाराः, स एव सर्वलोक- महनीयो यस्य वचनमन्यमनस्कतयाप्यायातं भवति शासनम् ॥ ८१ ॥ संसार के समस्त व्यवहार सज्जनों और असज्जनों के वचन के अधीन हैं । वही आदमी सब लोगों से महान् और पूज्य है जो उदासीन भाव से भी जो कुछ कह देता है वह उसका अनुशासन हो जाता है । अर्थात् ऐसा व्यक्ति जो जिस किसी रूप मे भी कह दे और उसका निर्वाह करे वही सर्वश्रेष्ठ है । १नैयोदिता वाग्वदति सत्या ह्येषा सरस्वती ॥ ८१ ॥ नीतियुक्त वचन ही सत्य सरस्वती का रूप है । व्यभिचारिवचनेषु नैहिकी पारलौकिकी वा क्रियाऽस्ति ॥ ८२ ॥ वचन का पालन न करने वालों का इहलोक तथा परलोक दोनों ही बिगड़ता है । न विश्वासघातात् परं पातकमस्ति ॥ ८३ ॥ विश्वासघात से बढ़कर दूसरा पातक नहीं है । विश्वासघातकः सर्वेषामविश्वासं करोति ॥ ८४ ॥ विश्वासघातक व्यक्ति सब पर स्वयं ही अविश्वास करता है । असत्यसन्धिषु कोशपानं ? जातानुजातान् हन्ति ॥ ८५ ॥ असत्य प्रतिज्ञ पुरुषों का शपथ करना उनके सन्तति का विनाश कर देता है । १. नाप्रेरिता वाग् देवता वदति ।