भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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प्रकीर्णसमुद्देशः १६३ ऋणदातुरासन्नं फलं परोपास्तिः कलहः परिभवः प्रस्तावेऽर्था- लाभश्च ॥ १६ ॥ ऋणदाता को तत्काल यही फल मिलता है कि उसे दूसरे की उपासना करनी पड़ती है अर्थात् जिसे ऋण दिया है उसके यहां जाकर मांगना पड़ता है, कलह होता है, ऋण लेने वाले के द्वारा तिरस्कार होता है और अपने काम के समय उसे अपना धन नहीं मिलता । अदातुस्तावत् स्नेहः सौजन्यं प्रियभाषणं वा साधुता च यावन्ना- र्थावाप्तिः ॥ १७ ॥ कर्ज लेकर फिर उसे न देने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति कर्ज लेनेवाले से तभी तक स्नेह, सजनता और प्रियभाषण तथा साधुता-पूर्ण व्यवहार रखता है जब तक कि उसे अर्थ अर्थात् कर्ज नहीं मिल जाता । तदसत्यमपि नासत्यं यत्र न सम्भाव्यार्थहानिः ॥ १८ ॥ झूठ बोलकर भविष्य की किसी विशेष अर्थहानि को बचाया जा सके अथवा महान् कार्य सिद्ध हो सके तो वह झूठ-मूठ नहीं है । प्राणवधे नास्ति कश्चिदसत्यवादः ॥ १९ ॥ झूठ बोलकर किसी निरपराध के प्राण बचाए जा सकें तो वह झूठ- मूठ नहीं है । अर्थाय मातरमपि लोको हिनस्ति किं पुनरसत्यं न भाषते ॥ २० ॥ धन के लिये लोग माता को भी मार डालते हैं तो क्या झूठ न बोलेंगे । अतः धन के सम्बन्ध में विश्वास नहीं करना चाहिए चाहे कितनी ही शपथ कोई क्यों न ले । सत्कला-सत्योपासनं हि विवाहकर्म, दैवायत्तस्तु वधूवरयो- र्निर्वाहः ॥ २१ ॥ सत् कलाओं की प्राप्ति, सत्य भाषण में स्वाभाविक रुचि ये विवाह के कर्त्तव्य-कर्म हैं और वधू तथा वर का निर्वाह पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति तो भाग्याधीन ही होती है । रतिकाले तन्नास्ति कामात्तों यन्न ब्रूते पुमान् , न चैतत्प्रमा- णम् ॥ २२ ॥ काम-बाधा से पीड़ित मनुष्य रति के समय अपनी प्रिया के विश्वास और प्रसन्नता के लिये ऐसी कौन सी बात है जो नहीं कहता किन्तु वह सब प्रामाणिक नहीं होतीं । तावत् स्त्री-पुरुषयोः परस्परं प्रीतिर्यावन्न प्रातिलोम्यं कलहो रतिः र्त्तवं च ॥ २३ ॥ १३ नी०