भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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प्रकीर्णसमुद्देशः १६७ मतवाले हाथी पर चढ़ने वाले का जीवन संशय में पड़ जाता है और नाश निश्चित रहता है । अत्यर्थं ह्यश्वविनोदोऽङ्गभङ्गमनापाद्य न तिष्ठति ॥ ४९ ॥ घोड़े के संग बहुत खिलवाड़ करने से कोई न कोई अङ्ग-भङ्ग हुए बिना नहीं रहता । ऋणमददानो दासकर्मणा निर्हरेत् ॥ ५० ॥ ऋण न दे सकने पर दास कर्म द्वारा ऋण दूर करना चाहिए । अन्यत्र यतिब्राह्मणक्षत्रियेभ्यः ॥ ५१ ॥ यति, ब्राह्मण और क्षत्रियों को छोड़कर अर्थात् संन्यासीब्राह्मण और क्षत्रिय पर यदि ऋण हो और वह न दे सकें तो उनसे नोकरी लेकर ऋण नहीं पूरा करना चाहिए । तस्यात्मदेह एव वैरी यस्य यथालाभमशनं शयनं च न सहते ॥५२॥ जो यथालाभ भोजन न कर सकें और सो न सकें उनके लिये अपना शरीर ही शत्रु के तुल्य होता है । तस्य किमसाध्यं नाम यो महामुनिरिव सर्वान्नीनः सर्वक्लेशसहः सर्वत्र सुखशायी च ॥ ५३ ॥ जो महामुनि के समान सब प्रकार का और सब का अन्न ग्रहण कर ले, सब प्रकार का क्लेश सह ले और सर्वत्र सुखपूर्वक सो सके उसके लिए कोई भी काम असाध्य नहीं है । स्त्रीप्रीतिरिव कस्य नामेयं स्थिरा लक्ष्मीः ॥ ५४ ॥ स्त्री की प्रीति के समान यह लक्ष्मी भी किसके पास स्थिर रह सकी है ? परपैशुन्योपायेन राज्ञां वल्लभो लोकः ॥ ५५ ॥ लोग दूसरों की चुगली और निन्दारूप उपाय से राजा के प्रियपात्र बनते हैं । नीचो महत्त्वमात्मनि मन्यते परस्य कृतेनापवादेन ॥ ५६ ॥ नीच पुरुष दूसरे की निन्दा करके अपना महत्त्व मानता है । न खलु परमाणोरल्पत्वेन महान् मेरुः किन्तु स्वगुणेन ॥ ५७ ॥ परमाणु सबसे छोटा पदार्थ है इस दृष्टि से महान् मेरु पर्वत की प्रशंसा नहीं की जाती, किन्तु उसके गुणों के कारण । न खलु निर्निमित्तं महान्तो भवन्ति कलुषितमनीषाः ॥ ५८ ॥ महान् व्यक्ति बिना किसी कारण के ही किसी के प्रति कलुषित भावना वाले नहीं होते ।