नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मसमुद्देशः ७ परोपदेश की सहजता— सुलभः खलु कथक इव परस्य धर्मोपदेशो लोकः ॥ २८ ॥ देवालयों में कथा बांचने वाले की तरह दूसरों को धर्मोपदेश करने वाले व्यक्ति सर्वत्र सुलभ होते हैं । प्रतिदिन के दान और तप की महिमा— प्रत्यहं किमपि नियमेन प्रयच्छतस्तपस्यतो वा भवन्त्यवशयं मही- यांसः परे लोकाः ॥ २६ ॥ प्रतिदिन नियम पूर्वक कुछ न कुछ दान और तपस्या करनेवाले व्यक्ति को निश्चय ही महान् परलोक प्राप्त होते हैं । प्रतिदिन का स्वल्प संचय भी विशेष फलवान् होता है— कालेन संचीयमानः परमाणुरपि जायते मेरुः ॥ ३० ॥ नित्य संचय करते रहने पर छोटी से छोटी वस्तु भी समय पाकर सुमेरु बन जाती है । धर्म, ज्ञान और धन का प्रतिदिन सङ्ग्रह करना चाहिए— धर्मश्रुतधनानां प्रतिदिनं लवोऽपि सङ्गृह्यमाणो भवति समुद्रा- दप्यधिकः ॥ ३१ ॥ धर्म, ज्ञान और धन का प्रतिदिन लेशमात्र भी सङ्ग्रह करते रहने पर समुद्र से भी अधिक हो जाता है । नित्य धर्माचरण न करने के दोष— धर्माय नित्यमनाश्रयमाणानामात्मवञ्चनं भवति ॥ ३२ ॥ . धर्म के निमित्त नित्य कुछ न करना आत्मवञ्चना है । पुण्य प्राप्ति के लिये नित्य प्रयत्न करना चाहिए— कस्य नाम एकदैव संपद्यते पुण्यराशिः ॥ ३३ ॥ एक बार ही किस को पुण्यराशि प्राप्त हो जाती है ? अर्थात् अनायास ही किसी को पुण्य-पुंज नहीं प्राप्त हो सकता; धीरे-धीरे क्रमशः पुण्य करते रहने पर ही पुण्य-पुञ्ज एकत्र होता है । अनुद्योगी के मनोरथों की निन्दा— अनाचरतो मनोरथाः स्वप्नराज्यसमाः ॥ ३४ ॥ उद्यम न करने वाले व्यक्ति के मनोरथ स्वप्न में प्राप्त राज्य के समान क्षणिक होते हैं । धर्म के लाभ जानते हुए भी अधर्माचार की निन्दा— धर्मफलमनुभवतोऽप्यधर्माऽनुष्ठानमनात्मज्ञस्य ॥ ३५ ॥ जो धर्म के फल का उपभोग करता हुआ भी अधर्म करता है वह मूर्ख है ।