नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० नीतिवाक्यामृतम् भस्मनीव निस्तेजसि को नाम निःशङ्कः पदं न कुर्यात् ॥ ४० ॥ बिना आग की भस्म पर कौन नहीं निडर होकर पैर रखेगा । पाप के लिये अपवाद— तत्पापमपि न पापं यत्र महान् धर्मानुबन्धः ॥ ४१ ॥ वह पाप पाप नहीं है जिसके करने से महान् धर्म होता है । विशेषार्थ—किसी एक दुष्ट का वध कर देने से हजारों-लाखों की यदि सुरक्षा होती हो तो उसका वध पाप कर्म नहीं होगा । अन्यथा पुनर्नरकाय राज्यम् ॥ ४२ ॥ अन्यथा अर्थात् उपर्युक्त रीति-नीति से दुष्ट दमन न करने पर राजा का राज्य उसके लिये नरक के समान ही दुःखकारक हो जाता है । अधिकार प्राप्ति से दोष— बन्धनान्तो नियोगः ॥ ४३ ॥ अधिकार बन्धन है । विशेषार्थ—मनुष्य को अधिकार मिलने पर अनेक प्रकार के कर्त्तव्यों के बन्धन में बंध जाना पड़ता है । दुष्टों की मित्रता का परिणाम— विपदन्ता खलमैत्री ॥ ४४ ॥ दुष्टों की मित्रता का अन्त विपत्ति में होता है । स्त्रियों पर विश्वास करने का फल— मरणान्तः स्त्रीषु विश्वासः ॥ ४५ ॥ स्त्रियों पर विश्वास करना अन्त में मृत्यु का कारण होता है । इत्यान्वीक्षिकी समुद्देशः । ७. त्रयीसमुद्देशः त्रयी का अर्थ— चत्वारो वेदाः, शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोज्योतिषमिति षडङ्गानीतिहास-पुराण मीमांसा-न्याय-धर्मशास्त्रमिति चतुर्दश विद्यास्था- नानि त्रयी ॥ १ ॥ चार वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त छन्द, ज्योतिष, ये षडङ्ग और इतिहास-पुराण, मीमांसा, न्याय और धर्मशास्त्र इन चौदह विद्या स्थानों को त्रयी कहते हैं ।