नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ नीतिवाक्यामृतम् शूद्रों के नियत कर्म— त्रिवर्णोपजीवनं कारुकुशीलवकर्म शकटोपवाहनं च शूद्राणाम् ॥१०॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा, शिल्पकार्य, कथक अथवा चारण कार्य और गाड़ी ढोना यह सब शूद्र के कर्त्तव्य हैं । सच्छूद्र के लक्षण— सकृत्परिणयनव्यवहाराः सच्छूद्राः ॥ ११ ॥ कन्याओं का एक बार ही विवाह करने की मर्यादा का पालन करनेवाले शूद्रों को सत् शूद्र कहते हैं । शूद्र भी देवपूजा आदि के अधिकारी होते हैं— आचारानवद्यत्वं शुचिरुपस्कारः शारीरी च विशुद्धिः करोति शूद्रमपि देवद्विजतपस्विपरिकर्मसु योग्यम् ॥ १२ ॥ अनिन्द्य, आचार-व्यवहार घर के सामानों को साफ सुथरा रखना, तथा शरीर की शुद्धि स्नानादि के द्वारा करने से शूद्र भी देवता, ब्राह्मण और तप- स्वियों की पूजा-परिचर्या के योग्य होते हैं । सर्वसाधारण के द्वारा पालन योग्य धर्म— आनृशंस्यममृषाभाषित्त्वं, परस्वनिवृत्तिः, इच्छा नियमः प्रति- लोमाविवाहो निषिद्धासु च स्त्रीषु ब्रह्मचर्यमिति सर्वेषां समानो धर्मः ॥ १३ ॥ मृदुता, असत्य भाषण न करना, पराये धन को न लेने की प्रवृत्ति, इच्छाओं पर नियन्त्रण स्वजाति में ही शास्त्रानुमोदित विवाह करना, निषिद्ध स्त्रियों के साथ समागम न करना, सब वर्ण और आश्रम वालों के लिये समानरूप से पालन करने योग्य धर्म हैं । साधारण धर्म की विशेषता— आदित्यालोकनवत् धर्मः खलु सर्व साधारणो विशेषानुष्ठाने तु नियमः ॥ १४ ॥ जिस प्रकार सूर्य का दर्शन करने का ब्राह्मण और चाण्डाल को समान अधिकार प्राप्त है उसी प्रकार मृदुता सत्यभाषिता आदि उपर्युक्त धर्म सबके लिये समान हैं । विशेष प्रकार के धर्मानुष्ठान के लिये ही विशेष नियम हैं । यतियों का स्वधर्म— निजागमोक्तमनुष्ठानं यतीनां स्वोधर्मः ॥ १५ ॥ अपने सम्प्रदाय के अनुकूल शास्त्रों में वर्णित आचार-विचार का परिपालन यतियों का स्वधर्म है ।