नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्रिसमुद्देशः ४१ मव्यभिचारिणमधीताखिलव्यवहारतन्त्रमखङ्गमशेषोपधिविशुद्धं च मन्त्रिणं कुर्वीत ॥ ५ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य में से किसी एक को जो अपने देश का हो, आचार व्यवहार और वंश से विशुद्ध हो, व्यसनी न हो, व्यभिचारी न हो, समस्त व्यवहार शास्त्र अर्थात् नीति और धर्मशास्त्र को पढ़ा हुआ हो, अस्त्र-शस्त्र जानने वाला हो और समस्त छल-छद्म से रहित हो, ऐसे व्यक्ति को मन्त्री बनाना चाहिये । स्वदेश प्रेम का गौरव — समस्तपक्षपातेषु स्वदेशपक्षपातो महान् ॥ ६ ॥ समस्त पक्षपातों में अपने देशका पक्षपात् महान् है। अर्थात् मन्त्री अपने देश का हो इसका सर्वप्रथम ध्यान रखना चाहिये । दुराचार निन्दा— विषनिषेक इव दुराचारः सर्वान् गुणान् दूषयति ॥ ७ ॥ विष सिञ्चन की भांति दुराचार सब गुणों को दूषित कर देता है। अकुलीन मन्त्री का दोष — दुष्परिजनो मोहेन कुतोऽप्यपकृत्य न जुगुप्सते ॥ ८ ॥ अकुलीन मन्त्री राजा का घृणित अपराध करके मूर्खता वश लज्जा का अनुभव नहीं करता, (परिजन का अर्थ यहां नौकर चाकर न करके प्रसङ्ग वश कुल किया गया है) । व्यसनी मन्त्री से राजा की क्षति— सव्यसनसचिवो राजा आरूढव्यालगज इव नासुलभोऽपायः ॥ ६ ॥ व्यसन शील मन्त्री वाले राजा का नाश दुष्ट हाथी पर चढ़ने वाले की तरह दुर्लभ नहीं होता अर्थात् शीघ्र ही संभव होता है । किं तेन केनापि यो विपदि नोपतिष्ठते ॥ १० ॥ जो विपत्ति में सहायक नहीं होता उससे क्या लाभ । भोज्येऽसम्मतोऽपि हि सुलभो लोकः ॥ ११ ॥ भोजन के लिये तो अनिमन्त्रित लोग भी सुलभ हो जाते हैं। अर्थात् सुख के साथी बिना ढूंढ़े भी मिल जाते हैं, पर दुःख के साथी नहीं होते। किं तस्य भक्त्या यो न वेत्ति स्वामिनो हितोपायमहितप्रती- कारं वा ॥ १२ ॥ जो मन्त्री राजा की भलाई का और बुराई को दूर करने का उपाय न जानता हो उसकी भक्ति से क्या लाभ ।