नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ नीतिवाक्यामृतम् स्त्री, धनादि का लोभी पुरुष अधिकारी बनने योग्य नहीं है। अर्थ लोभी मन्त्री के दोष— मन्त्रिणोऽर्थग्रहणलालसायां मतौ न राजकार्यमर्थोवा ॥ १०६ ॥ जब मन्त्री को धन की स्पृहा हो जाती है तब न तो राजा की कार्य सिद्धि होती है न धन होता है। उदाहरण द्वारा उक्तनीति का समर्थन— वरणार्थं प्रेषित एव यदि कन्यां परिणयति तदा वरयितुस्तप एव शरणम् ॥ १०७ ॥ किसी के विवाहार्थ कन्या को देखने के लिये भेजा गया व्यक्ति ही जब उस कन्या से विवाह कर ले तो वर के लिये तप ही शरण है। प्रसङ्गानुसार आशय है कि यदि मन्त्री स्वयं ही अधिकार और धन-लोलुप हो जाय तो राजा क्या करेगा ? दृष्टान्त— स्थाल्येव भक्तं चेद् स्वयमश्नाति कुतो भोक्तुर्भुक्तिः ॥ १०८ ॥ बटलोई ही अगर भात को स्वयं खाने लगेगी तो भोजन करने वाले को किस प्रकार भोजन मिल सकेगा ? मानवीय शुचिता की सीमा— तावत् सर्वोऽपि शुचिर्निः स्पृहोयावन्न परस्त्रीदर्शनमर्थागमोवा ॥१०९॥ तब तक सभी मनुष्य शुद्ध और निःस्पृह होते है जब तक उनको परस्त्री दर्शन और धनागम नहीं होता है। निर्दोष को दोषी सिद्ध करने से, हानि — अदुष्टस्य हि दूषणं सुप्तव्यालप्रबोधनमिव ॥ ११० ॥ निर्दोष को दोषी बनाना सोए हुए सर्प को जगाने के समान है। एक बार फटा मन फिर नहीं जुड़ता— सकृद्विघटितं चेतः स्फटिकवलयमिव कः सन्धातुमीश्वरः ॥१११॥ एक बार फटे हुए मन को स्फटिक के कङ्कन के समान कौन दुबारा जोड़ सकता है। मेल की अपेक्षा बैर सहज होता है— न महतांप्युपकारेण चित्तस्य तथानुरागो यथा विरागो भवत्यल्पेना- प्यपकारेण ॥ ११२ ॥ बहुत बड़े उपकार के कार्य से भी चित्त में उतना अनुराग नहीं उत्पन्न होता जितना कि थोड़े से भी अपकार से विराग होता है।