नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ नीतिवाक्यामृतम् सहाध्यायी के प्रति कर्त्तव्य— सहाध्यायिषु बुद्धयतिशयेन नाभिभूयेत ॥ १९ ॥ अपनी बुद्धि यदि अन्य छात्रों की अपेक्षा अधिक तीक्ष्ण हो तो उससे सह- पाठियों का पराभव-तिरस्कार न करे । गुरु के साथ व्यवहार— प्रज्ञायातिशायानो न गुरुमवज्ञायेत ॥ २० ॥ अपनी बुद्धि यदि गुरु से अधिक श्रेष्ठ हो तो उससे गुरु का अनादर न करे । सकिमभिजातो मातरि यः पुरुषः शूरो वा पितरि ॥ २१ ॥ क्या वह पुत्र कुलीन कहा जा सकता है जो कि माता अथवा पिता के प्रति शूरता प्रदर्शित करता है । अननुज्ञातो न क्वचिद् व्रजेत् ॥ २२ ॥ गुरु से बिना आज्ञा लिये हुए कहीं न जाय । मार्गमचलं जलाशयं च नैकोऽवगाहयेत् ॥ २३ ॥ लम्बे मार्ग पर, पहाड़ पर और जलाशय पर अकेले नहीं जाना चाहिए। पितरमिव गुरुमुपचरेत् ॥ २४ ॥ पिता के समान ही गुरु की सेवा करे । गुरुपत्नीं जननीमिव पश्येत् ॥ २५ ॥ गुरुपत्नी को माता के समान देखे । गुरुमिव गुरुपुत्रं पश्येत् ॥ २६ ॥ गुरु के समान ही गुरु पुत्र को भी समझे । सब्रह्मचारिणि बान्धव इव स्निह्येत् ॥ २७ ॥ साथी ब्रह्मचारियों और सहपाठियों के साथ बान्धवों के समान स्नेह करे । ब्रह्मचर्यमाषोडशाद्वर्षात्ततो गोदानपूर्वकं दारकर्म चास्य ॥ २८ ॥ सोलह वर्ष तक ब्रह्मचर्य से रहे अनन्तर गोदान करके विवाह करे । पढ़ने का क्रम— समविद्यैः सहाधीतं सर्वदाभ्यस्येत ॥ २९ ॥ पढ़े हुए विषय का अपने सहपाठियों के साथ सदा अभ्यास करे । अपनी दुर्दशा का गुप्त रखना — गृहदौःस्थित्यमागन्तुकानां पुरतो न प्रकाशयेत् ॥ ३० ॥ अपने घर की दुरवस्था आगन्तुकों के आगे न प्रकाशित करे ।