भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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चारसमुद्देशः ७७ करने वाला वैतालिक-चारण भाट, बन्दी आदि और सूत-कथा वाचक ये 'वाग्जीवो' हैं। गणकः संख्याविद् दैवज्ञो वा ॥ २७ ॥ गणित का पण्डित अथवा ज्योतिषी 'गणक' है। शाकुनिकः शकुनवक्ता ॥ २८ ॥ तरह-तरह के भले-बुरे सगुन बताने वालों का नाम शाकुनिक है। भिषगायुर्वेदविद्वैद्यः शल्यकर्मविच्च ॥ २९ ॥ आयुर्वेद जानने वाला वैद्य और शस्त्र कर्म अर्थात् चीड़-फाड़ जानने वाला भिषक् है। ऐन्द्रजालिकस्तन्त्रयुक्त्या मनोविस्मयकरो मायावी वा ॥ ३० ॥ तन्त्रशास्त्रों की युक्तियों द्वारा मन को चकित कर देने वाला मायावी 'ऐन्द्रजालिक' कहा जाता है। नैमित्तिको लक्ष्यवेधदैवज्ञो वा ॥ ३१ ॥ लक्ष्यवेध करने वाला अथवा, दैवज्ञ 'नैमित्तिक' है। महानसिकः सूदः ॥ ३२ ॥ रसोई बनाने वाला 'सूद' है। विचित्रभक्ष्यप्रणेता अरालिकः ॥ ३३ ॥ विभिन्न प्रकार के भोजन बनाने वाले को आरालिक कहते हैं। अङ्गमर्दनकलाकुशलो भारवाहको वा संवाहकः ॥ ३४ ॥ अङ्गमर्दन की कला में कुशल अथवा बोझा ढोने वाले कुली की 'संवा- हक' संज्ञा है। द्रव्यहेतोः कृच्छ्रेण कर्मणा यः स्वजीवितविक्रयी स तीक्ष्णोऽसह्यो वा ॥ ३५ ॥ पैसे के लिये अत्यन्त कठोर कर्म शेर बाघ आदि से लड़ना आदि के द्वारा जो अपने प्राणों तक की बाजी लगा दे उसको 'तीक्ष्ण' अथवा 'असह्य' कहते हैं। बन्धुषु निःस्नेहाः क्रूराः ॥ ३६ ॥ बन्धु-बान्धवों के प्रति स्नेह रहित व्यक्ति को 'क्रूर' कहते हैं। अलसाश्च रसदाः ॥ ३७ ॥ आलसी आदमियों की 'रसद' संज्ञा है। [ इति चारसमुद्देशः ]