न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 10, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ८ ] परन्तु योगिज्ञान में भी तरतम-भेद के कारण वह सब के लिए सर्वथा प्रमाण नहीं हो सकता। अथच, पूर्ण योगी की बात 'आप्तवचन' में ही सम्मिलित मानी जायेगी। जब कि हम कह चुके हैं कि यह दर्शन 'आप्तवचन' को ही एकान्ततः प्रमाण नहीं मानता, अपितु साधारण जन को बोधगम्य बनाने के लिये, कोई भी बात प्रमाण के आधार पर कहता है। प्रमाणों में भी यह दर्शन 'अनुमान प्रमाण' को अधिक महत्त्व देता है; क्यों कि आध्यात्मिक विषय (जो कि इस दर्शन के लक्ष्य हैं) अनुमानप्रमाणैकगम्य हैं। अनुमान प्रमाण में परार्थानुमान की प्रतिज्ञादि-पञ्चावयवकल्पना 'अक्षपाद' की अपनी है। यह कल्पना तर्कशास्त्र में ऐसी खरी उतरी कि अक्षपाद के बाद सभी दार्शनिक इसी कल्पना के सहारे स्वपक्षस्थापन का प्रयास करते रहे हैं। इसी से इस कल्पना का महत्त्व सिद्ध है। इस कल्पना में अनुमान तथा तर्क गणित की तरह रखे जाने से, वह साधारणजन को भी समझ में आ जाती है। उदाहरण के लिये—सामने पर्वत पर कहीं धूम दिखायी दे रहा है, हम समझ गये कि वहाँ अग्नि है; परन्तु अपने सहयोगी को यह बात समझाने के लिये कि उसे भी पर्वतस्थ अग्नि का हमारी तरह पूर्ण विश्वास हो जाये, हम इस बात को पाँच वाक्यावयवों में रखेंगे। उन वाक्यावयवों को क्रमशः—१. प्रतिज्ञा, २. हेतु, ३. उदाहरण, ४. उपनय तथा ५. निगमन कहते हैं। जैसे—'यह पर्वत अग्निमान् है, क्योंकि वहाँ धूम दिखाई दे रहा है, महानस की तरह—जहाँ धूम होता है वहाँ अग्नि होती है जैसे महानस, उसी तरह का यह है, अतः यह पर्वत अग्निमान् है'। इस वाक्य में पहले अपनी बात की प्रतिज्ञा की गयी कि 'पर्वत अग्निमान् है,' फिर उसमें हेतु दिखाया गया—'क्योंकि वहाँ धूम दिखायी देता है'; फिर उस प्रतिज्ञा तथा हेतु में अन्यत्र धूमदर्शन का व्यापक दृष्टान्त दिया गया—'महानस की तरह, जहाँ-जहाँ धूम होता है वहाँ अग्नि होती है जैसे महानस'; अब फिर प्रतिज्ञा, हेतु तथा दृष्टान्त का उपनय (संगमन) किया गया कि 'उसी तरह का यह है'; यों कह कर पर्वत में अग्निमत्त्व सिद्ध करके अन्त में फिर निगमन कर दिया (अपनी प्रतिज्ञा दोहरा दी)—'अतः यह पर्वत अग्निमान् है'। अपनी बात को यों तर्क के साथ रखने से हमारे सहयोगी को भी विश्वास हो गया कि पर्वत में अग्नि है। अपरोक्ष पदार्थों के विषय में यह प्रणाली अपनायी जाये तो हम किसी भी बात का सुगम रीति से तत्त्वनिर्णय कर सकते हैं; क्योंकि यह तर्कप्रधान है। अक्षपाद ने अपने दर्शन में आदि से अन्त तक यही प्रणाली अपनायी है, अतः इस तर्कप्रधान प्रणाली के आधार पर इस दर्शन का नाम ही 'तर्क' या 'न्याय' पड़ गया। इसी लिए वात्स्यायन ने भी कहा है—'प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः प्रत्यक्षागमाश्रितमनुमानम्; सान्वीक्षा' अर्थात् प्रमाणों से अर्थपरीक्षण 'न्याय' कहलाता है, वह प्रमाण है प्रत्यक्ष तथा आगम के अनुकूल अनुमान; इस अनुमान को ही 'आन्वीक्षिकी विद्या' कहते हैं। इसकी प्रशस्ति में वे कहते हैं— CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri