भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१५. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८७ दृष्टान्ते दर्शयितव्यमिति, न च तर्हि प्रत्यक्षादीनामप्रमाण्यम् । अथ प्रत्यक्षादीना- मप्रामाण्यम् ? उपादीयमानमप्युदाहरणं नार्थं साधयिष्यतीति । सोऽयं सर्वप्रमाणै- र्व्याहतो हेतुरहेतुः 'सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः' ( १. २. ६) इति । वाक्यार्थो ह्यस्य सिद्धान्तः । स च वाक्यार्थः- प्रत्यक्षादीनि नार्थं साधयन्तीति । इदं चावयवानामुपादानमर्थस्य साधनायेति । अथ नोपादीयते ? अप्रदर्शितहेत्व- र्थस्य दृष्टान्ते न साधकत्वमिति निषेधो नोपपद्यते; हेतुत्वासिद्धेरिति ॥ १३ ॥ तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः ॥ १४ ॥ प्रतिषेधलक्षणे स्ववाक्ये तेषामवयवाश्रितानां प्रत्यक्षादीनां प्रामाण्येऽभ्यनु- ज्ञायमाने परवाक्येऽप्यवयवाश्रितानां प्रामाण्यं प्रसज्यते; अविशेषादिति । एवं च न सर्वाणि प्रमाणानि प्रतिषिध्यन्त इति । विप्रतिषेध इति 'वि' इत्ययमुपसर्गः संप्रतिपत्त्यर्थे, न व्याघाते; अर्थाभावादिति ॥ १४ ॥ त्रै काल्याप्रतिषेधश्च शब्दादातोद्यसिद्धिवत् तत्सिद्धेः ॥ १५ ॥ किमर्थं पुनरिदमुच्यते ? पूर्वोक्तनिबन्धनार्थम् । यत्तावत्पूर्वोक्तम्- 'उपलब्धि- दिखाना पड़ेगा । इससे प्रत्यक्षादि का अप्रमाणत्व फिर भी नहीं बनेगा । यदि प्रत्यक्षादि का अप्रामाण्य ही मान लें तो दिया हुआ उदाहरण अर्थ को सिद्ध न कर सकेगा- इसलिए वह हेतु हेतु नहीं होगा । अतः यह जिस 'सिद्धान्त का आश्रय लेकर प्रवृत्त है उसका विरोध करने वाला विरुद्ध' (१.२.६) हेत्वाभास होगा; क्योंकि 'प्रत्यक्षादि प्रमाण अर्थ की सिद्धि नहीं करते' यह वाक्यार्थ ही पूर्वपक्षी का सिद्धान्त है, और उसके द्वारा यह प्रतिज्ञादि पांचों अवयवों का ग्रहण भी अर्थसिद्धि के लिये ही करना पड़ता है । यदि इनका ग्रहण न किया जाय तो अप्रदर्शित हेत्वर्थ की दृष्टान्त में साधकता नहीं बनेगी, तब प्रतिषेध भी कैसे हो सकेगा; क्योंकि हेतुत्व ही सिद्ध नहीं हुआ ॥ १३ ॥ अवयवाश्रित प्रत्यक्ष आदि को प्रमाण मानने पर समग्र प्रमाणों का प्रतिषेध सिद्ध न होगा ॥ १४ ॥ प्रतिषेधलक्षणक स्ववाक्य में यदि पूर्वपक्षी उन अवयवों पर आश्रित प्रत्यक्षादि को प्रमाण मानता है तो सिद्धान्ती के वाक्य में अवयवाश्रितत्व समानता के कारण प्रत्यक्षादि को प्रमाण मानना पड़ेगा; इस तरह सब प्रमाण प्रतिषिद्ध कहाँ हुए ! 'विप्रतिषेध' शब्द में 'वि' यह उपसर्ग 'समग्र प्रमाणों के निषेध का यथार्थ ज्ञान' का बोधक है, न कि विरोध का; क्योंकि 'विरोध' अर्थ मानने का कोई प्रयोजन नहीं है ॥ १४ ॥ ध्वनिरूप शब्द से वाद्ययन्त्र की सिद्धि की तरह प्रमाणरूप कारण को सिद्धि होने से प्रमाणों में त्रैकाल्य-प्रतिषेध भी नहीं बनेगा ॥ १५ ॥ यह बात पहले ( २. १. ११ में ) कह ही आये, अब फिर क्यों कही जा रही है ?