न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें९० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १ आ० कर्म । वृक्षेण चन्द्रमसं ज्ञापयतीति ज्ञापकस्य साधकतमत्वात् करणम् । 'वृक्षा- योदकमासिञ्चति' इति आसिच्यमानेनोदकेन वृक्षमभिप्रेतीति सम्प्रदानम् । वृक्षात्पर्णं पततीति 'ध्रुवमपायेऽपादानम्' इत्यपादानम् । वृक्षे वयांसि सन्तीति 'आधारोऽधिकरणम्' इत्यधिकरणम् । एवं च सति न द्रव्यमात्रं कारकम्, न क्रियामात्रम्, किं तर्हि ? क्रियासाधनं क्रियाविशेषयुक्तं कारकम् । यत्क्रिया- साधनं स्वतन्त्रः स कर्ता, न द्रव्यमात्रं न क्रियामात्रम् । क्रियया व्याप्तुमिष्य- माणतमं कर्म, न द्रव्यमात्रं न क्रियामात्रम् । एवं साधकतमादिष्वपि । एवं च कारकार्थान्वाख्यानं यथैव उपपत्तितः, एवं लक्षणतः कारकान्वाख्यानमपि न द्रव्यमात्रेण न क्रियया वा; किं तर्हि ? क्रियासाधने क्रियाविशेषयुक्त इति । कारकशब्दश्चायं प्रमाणं प्रमेयमिति, स च कारकधर्मं न हातुमर्हति ॥ १६ ॥ अस्ति भोः ! कारक शब्दानां निमित्तवशात् समावेशः । प्रत्यक्षादीनि च प्रमाणानि, उपलब्धिहेतुत्वात्; प्रमेयं चोपलब्धिविषयत्वात् । संवेद्यानि च क्रिया से ईप्सा का विषय होने के कारण वही 'कर्म' हो गया है। इसी प्रकार 'वृक्ष से चन्द्रमा को दिखाता है' यहाँ ज्ञप्ति का साधन होने से वही वृक्ष 'करण' है । 'वृक्ष को जल सींचता है' इस वाक्य में सींचे जाने वाले जल का वृक्ष अभिप्रेत है अतः वह 'सम्प्र- दान' है । 'वृक्ष से पत्ते गिरते हैं' इसमें 'ध्रुवमपायेऽपादानम्' ( पा० सू० १.४.२४ ) इस पाणिनि के नियम से वही वृक्ष 'अपादान' है ।'वृक्ष पर पक्षी बैठे हैं' इस वाक्य में 'आधारो- ऽधिकरणम्' ( पा० सू० ४. १. २५ ) इस नियम से पक्षियों का आधार बन जाने से वह 'अधिकरण' है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि द्रव्य या क्रिया ही कारक नहीं होते;' अपितु क्रिया ( व्यापार ) का साधन तथा क्रिया ( व्यापार ) विशेष से युक्त कारक होता है। जो स्वतन्त्र रहता हुआ क्रिया का साधन है वह 'कर्ता' कहलाता है न कि केवल द्रव्य या केवल क्रिया । इसी तरह क्रिया से ईप्सिततम कारक 'कर्म' कह- लाता है, न कि केवल द्रव्य या केवल क्रिया । इसी प्रकार साधकतम ( क्रिया का अत्यन्त साधक ) 'करण' आदि कारकों के विषय में भी समझ लेना चाहिये। इस प्रकार जैसे कारक के अर्थ का अन्वाख्यान युक्ति से किया गया है उसी तरह कारकों का स्वरूपकथन भी केवल द्रव्य या क्रिया से नहीं; अपितु 'क्रिया (व्यापार) विशेष से युक्त क्रियासाधन'- ऐसा कर लेना चाहिए। यह 'कारक' शब्द प्रमाण भी है, प्रमेय भी है, यह दोनों अवस्थाओं में अपने 'कारकत्व' को नहीं छोड़ता ॥ १६ ॥ शङ्का—हम उक्त रीति से कारकों का निमित्तों के सम्बन्धों से समावेश होना मान लेते हैं । प्रकृत में - प्रत्यक्षादि उपलब्धिहेतु होने से प्रमाण हैं, उपलब्धिविषय होने से प्रमेय हैं। ये प्रत्यक्षादि संवेद्य (विभाग से जानने योग्य) भी हैं, क्योंकि 'प्रत्यक्ष से जानता हूँ', 'अनुमान से जानता हूँ', 'उपमान से जानता हूँ' 'शब्द प्रमाण से जानता हूँ' —ऐसा CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri