न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९३ प्रमाणविशेषी विभज्य वचनीयः । यथा च दृश्यः सन् प्रदीपप्रकाशो दृश्यान्तराणां दर्शनहेतुरिति दृश्यदर्शनव्यवस्थां लभते, एवं प्रमेयं सत्किञ्चिदर्थजातमुपलब्धि- हेतुत्वात् प्रमाणप्रमेयव्यवस्थां लभते । सेयं प्रत्यक्षादिभिरेव प्रत्यक्षादीनां यथा- दर्शनमुपलब्धिर्न प्रमाणान्तरतः, न च प्रमाणमन्तरेण निःसाधनेति । तेनैव तस्याग्रहणमिति चेद् ? न; अर्थभेदस्य लक्षणसामान्यात् । प्रत्यक्षा- दीनां प्रत्यक्षादिभिरेव ग्रहणमित्ययुक्तम्, अन्येन ह्यन्यस्य ग्रहणं दृष्टमिति ? न; अर्थभेदस्य लक्षणसामान्यात् । प्रत्यक्षलक्षणेनानेकोऽर्थः सङ्गृहीतः, तत्र केनचित् कस्यचिद् ग्रहणमित्यदोषः । एवमनुमानादिष्वपीति । यथा—उद्धृतेनोदकेना- शयस्थस्य ग्रहणमिति । ज्ञातृमनसोश्च दर्शनात् । अहं सुखी, अहं दुःखी चेति तेनैव ज्ञात्रा तस्यैव ग्रहणं दृश्यते । 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इति च तेनैव मनसा तस्यैवानुमानं दृश्यते, ज्ञातुर्ज्ञेयस्य चाभेदो ग्रहणस्य ग्राह्यस्य चाभेद इति । चाहिये । और जैसे प्रदीपप्रकाश स्वयं दृश्य होता हुआ दृश्यान्तर का दर्शनहेतु बनकर दृश्य ( प्रमेय ) दर्शन ( प्रमाण ) व्यवस्था को प्राप्त कर लेता है, इसी प्रकार आत्मादि (पदार्थ) भी जब स्वयं ज्ञान का विषय होता है तो 'प्रमेय', तथा जब किसी अन्य पदार्थ के ज्ञान का साधन बन जाता है तो 'प्रमाण' कहलाता है । यों यह प्रत्यक्षादि का ज्ञान प्रत्यक्षादि की उपलब्धि के अनुसार गृहीत हो जाता है, इसके लिए न प्रमाणान्तर की आवश्यकता है, न प्रमाणान्तर के बिना यह असाधन ही है । यदि यह कहें कि उसी ( प्रत्यक्ष ) से उस ( प्रत्यक्ष ) का ग्रहण नहीं होगा ? तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रत्यक्षादि सभी रूप अर्थ प्रत्यक्ष के साधारण लक्षण से गृहीत हैं । तात्पर्य यह है कि प्रत्यक्षादि से प्रत्यक्षादि का ग्रहण युक्त नहीं, क्योंकि दूसरा दूसरे को देखता है—ऐसा ही लोक में देखा जाता है ? नहीं, क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रत्यक्षादि रूप अर्थों में साधारण लक्षण समान है । उस प्रत्यक्ष के लक्षण में अनेक अर्थ संगृहीत हैं, अतः वहाँ किसी से किसी न किसी का ग्रहण हो जायेगा—अतः कोई दोष नहीं । इसी तरह अनुमानादि के विषय में भी समझना चाहिये; जैसे—जला- शय से उद्धृत जल का अनुमान होता है । ज्ञाता ( आत्मा ) तथा मन में अपने से ही अपना ज्ञान होता है । 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ'—यह उस ज्ञाता द्वारा उसका अपने विषय में ही ज्ञान देखा जाता है । 'युगपद् ज्ञान का अनुत्पाद मन की सत्ता में हेतु हैं' ( १. १. १६ ) इस लक्षण से उसी मन से उस मन का अनुमान देखा जाता है । आत्मा में ज्ञाता तथा ज्ञेय का, और मन में ग्रहण व ग्राह्य का अभेद ही है, अतः वे स्व से स्व का ज्ञान करने में असमर्थ नहीं होते । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri